Edited By Ramanjot,Updated: 24 Feb, 2026 06:28 PM

भारत में बांझपन के 50% मामलों के लिए पुरुष कारक जिम्मेदार हैं। हालिया शोध के अनुसार, पिछले 30 वर्षों में भारतीय पुरुषों के स्पर्म काउंट में 30-40% की गिरावट आई है।
Male Infertility Reasons: नेशनल मेडिकल जर्नल ऑफ इंडिया (NMJI) में प्रकाशित एक हालिया शोध रिपोर्ट ने भारतीय पुरुषों के स्वास्थ्य को लेकर खतरे की घंटी बजा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, दंपतियों में बांझपन के लगभग 50% मामलों के लिए पुरुष कारक (Male Factors) जिम्मेदार हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि 30 से 35 वर्ष की आयु के पुरुषों में 'ओलिगोस्पर्मिया' (शुक्राणुओं की कम संख्या) और 'एज़ोस्पर्मिया' (शुक्राणुओं का शून्य होना) जैसी गंभीर समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं।
प्रमुख कारण: क्यों घट रही है पुरुष प्रजनन क्षमता?
चिकित्सकों के अनुसार, पुरुष बांझपन के पीछे निम्नलिखित कारक प्रमुख हैं:
वैरीकोसील (Varicocele): यह पुरुषों में बांझपन का सबसे बड़ा कारण है। इसमें अंडकोष की नसों में सूजन आ जाती है, जिसे पुरुष अक्सर अनदेखा कर देते हैं। यह स्थिति शुक्राणुओं के उत्पादन और गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित करती है।
जीवनशैली और नशा: तंबाकू, धूम्रपान और अत्यधिक शराब का सेवन शुक्राणुओं के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। इसके अलावा, बढ़ता मोटापा भी एक बड़ी वजह है।
पर्यावरणीय और कार्यस्थल का प्रभाव: जो पुरुष अत्यधिक गर्मी वाले वातावरण (जैसे भट्टी, वेल्डिंग) में काम करते हैं या लंबे समय तक ड्राइविंग करते हैं, उनके अंडकोष का तापमान बढ़ जाता है, जिससे स्पर्म प्रोडक्शन प्रभावित होता है। औद्योगिक रसायनों और कीटनाशकों का संपर्क भी बांझपन की दर बढ़ा रहा है।
AIIMS की रिपोर्ट: तीन दशक में बड़ा बदलाव
एम्स (AIIMS) के विशेषज्ञों के मुताबिक, पिछले तीन दशकों में भारतीय पुरुषों के स्पर्म काउंट में 30 से 40% तक की भारी गिरावट दर्ज की गई है। यह आंकड़ा न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए, बल्कि जनसांख्यिकीय दृष्टिकोण से भी चिंताजनक है।
समय रहते सुधार जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि बांझपन को लेकर समाज में फैली कुरीतियों और झिझक को खत्म करना जरूरी है। अंडकोष में सूजन या किसी भी प्रकार की असुविधा होने पर उसे नजरअंदाज न करें और तुरंत किसी विशेषज्ञ (यूरोलॉजिस्ट/एंड्रोलॉजिस्ट) से परामर्श लें। अपनी जीवनशैली में बदलाव, संतुलित आहार और हानिकारक रसायनों व नशों से दूरी बनाकर इस समस्या के जोखिम को कम किया जा सकता है।