बॉम्बे हाई कोर्ट का बड़ा फैसला- सिख पुरुषों को हेलमेट से छूट 'समानता के अधिकार' का उल्लंघन नहीं

Edited By Updated: 01 Jul, 2026 04:24 PM

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मुंबई उच्च न्यायालय ने पगड़ी पहनने वाले सिख पुरुषों को दोपहिया वाहन चलाते समय हेलमेट पहनने से मिली छूट को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए कहा कि यह छूट धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि ''उचित वर्गीकरण'' के आधार पर दी गई है। नागपुर पीठ की...

नेशनल डेस्क: मुंबई उच्च न्यायालय ने पगड़ी पहनने वाले सिख पुरुषों को दोपहिया वाहन चलाते समय हेलमेट पहनने से मिली छूट को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए कहा कि यह छूट धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि ''उचित वर्गीकरण'' के आधार पर दी गई है। नागपुर पीठ की न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फाल्के और न्यायमूर्ति निवेदिता मेहता ने सोमवार को 23 वर्षीय छात्र कीर्तेश चौधरी द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया। याचिका में मोटर वाहन अधिनियम की धारा 129 के उस प्रावधान को चुनौती दी गई, जिसके तहत यह छूट दी गई है।

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याचिकाकर्ता का दावा था कि यह प्रावधान संविधान में प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है। उच्च न्यायालय ने कहा कि यह याचिका गलत धारणा के आधार पर दायर की गई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान का अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) वर्ग-विशेष के पक्ष में बनाए गए मनमाने कानूनों पर रोक लगाता है, लेकिन युक्तिसंगत और तार्किक आधार पर किए गए वर्गीकरण की अनुमति देता है। उच्च न्यायालय ने कहा, ''अनुच्छेद 14 उचित वर्गीकरण की अनुमति देता है, जिसका अर्थ है कि अगर कोई वैध और तार्किक आधार तथा जन उद्देश्य हो, तो सरकार अलग-अलग समूहों के लिए अलग-अलग वर्ग बना सकती है।'' '

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अदालत ने कहा, ''सिख समुदाय के लोगों को दी गई छूट जाति, पंथ या धर्म के आधार पर नहीं है।'' मोटर वाहन अधिनियम की धारा 129 के तहत, दोपहिया वाहन चलाने वाले हर व्यक्ति को हेलमेट पहनना जरूरी है। इस धारा के एक प्रावधान में कहा गया है कि यह नियम पगड़ी पहनने वाले सिख व्यक्ति पर लागू नहीं होगा। याचिका में दावा किया गया था कि कानून के समक्ष समानता का अर्थ है कि किसी भी व्यक्ति या वर्ग को कोई विशेष अधिकार नहीं होना चाहिए। केंद्र सरकार ने इस याचिका का विरोध करते हुए दावा किया कि यह छूट एक उचित वर्गीकरण है। उच्च न्यायालय ने कहा कि हेलमेट की अनिवार्यता का कानून लोगों की जान बचाने के लिए बनाया गया, लेकिन इस छूट को किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता। 

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