Edited By Parveen Kumar,Updated: 20 Apr, 2026 10:55 PM

दिल्ली शराब नीति केस में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा का फैसला सिर्फ एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि ‘माय वे या हाईवे’ वाली सोच पर सीधा प्रहार है। केजरीवाल पक्ष की ‘रिक्यूज़ल’ मांग को कोर्ट ने साफ़ कहा न सबूत, न कानूनी आधार… सिर्फ़ आशंकाएं और आरोप।
नेशनल डेस्क : दिल्ली शराब नीति केस में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा का फैसला सिर्फ एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि ‘माय वे या हाईवे’ वाली सोच पर सीधा प्रहार है। केजरीवाल पक्ष की ‘रिक्यूज़ल’ मांग को कोर्ट ने साफ़ कहा न सबूत, न कानूनी आधार… सिर्फ़ आशंकाएं और आरोप।
यही वह सोच है, जिसे आजकल ‘अर्बन नक्सल’ मानसिकता कहा जाता है जहां संस्थाएं तभी तक स्वीकार्य हैं, जब तक फैसला अपने पक्ष में हो। जैसे ही कानून आईना दिखाता है, तुरंत नैरेटिव, आरोप और जज पर सवाल!
दिल्ली शराब नीति केस में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा का फैसला सिर्फ एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि ‘माय वे या हाईवे’ वाली सोच पर सीधा प्रहार है।
केजरीवाल पक्ष की ‘रिक्यूज़ल’ मांग को कोर्ट ने साफ़ कहा न सबूत, न कानूनी आधार… सिर्फ़ आशंकाएं और आरोप।
यही वह सोच है, जिसे आजकल ‘अर्बन नक्सल’… pic.twitter.com/KZQm1pvXti
— RP Singh National Spokesperson BJP (@rpsinghkhalsa) April 20, 2026
कोर्ट का स्पष्ट संदेश न्यायिक प्रक्रिया किसी के दबाव, प्रोपेगेंडा या मीडिया-चालित नैरेटिव से नहीं चलेगी। हर बेबुनियाद आरोप केवल एक जज नहीं, पूरी न्याय व्यवस्था को निशाना बनाता है। आज फिर साबित हुआ भारत में कानून ‘नैरेटिव गैंग’ से नहीं, संविधान और साक्ष्यों से चलता है। ड्रामा और दबाव की राजनीति यहां नहीं चलेगी।