Solar Eclipse 2026: क्या सच में राहु निगलता है सूर्य? जानिए क्या है पौराणिक कथा

Edited By Updated: 16 Feb, 2026 06:37 PM

surya grahan 17 february 2026

साल 2026 का पहला सूर्य ग्रहण 17 फरवरी (मंगलवार) को लगने जा रहा है। यह फाल्गुन अमावस्या के दिन पड़ रहा है और खगोलीय रूप से यह अनुलर सूर्य ग्रहण (Annular Solar Eclipse) होगा।

नेशनल डेस्क: साल 2026 का पहला सूर्य ग्रहण 17 फरवरी (मंगलवार) को लगने जा रहा है। यह फाल्गुन अमावस्या के दिन पड़ रहा है और खगोलीय रूप से यह अनुलर सूर्य ग्रहण (Annular Solar Eclipse) होगा। इस तरह के ग्रहण को आम भाषा में “Ring of Fire” कहा जाता है, क्योंकि इस दौरान चंद्रमा सूर्य को पूरी तरह नहीं ढक पाता और उसके चारों ओर आग की अंगूठी जैसा चमकीला घेरा दिखाई देता है।

मुख्य जानकारी एक नजर में

  • तारीख    17 फरवरी 2026 (मंगलवार)
  • प्रकार    अनुलर (Ring of Fire) सूर्य ग्रहण
  • शुरू (IST)    दोपहर 3:26 बजे
  • समाप्त (IST)    शाम 7:57 बजे
  • कुल अवधि    लगभग 4 घंटे 31 मिनट
  • पीक टाइम    करीब 5:42 बजे
  • भारत में दृश्यता    दिखाई नहीं देगा
  • सूतक काल    लागू नहीं
  • राशि/नक्षत्र    कुंभ राशि, धनिष्ठा नक्षत्र

कहां दिखाई देगा ‘रिंग ऑफ फायर’?

यह खास ग्रहण मुख्य रूप से अंटार्कटिका, दक्षिणी अफ्रीका (दक्षिण अफ्रीका, मेडागास्कर), दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों (अर्जेंटीना और चिली के दक्षिणी क्षेत्र) तथा प्रशांत, अटलांटिक और हिंद महासागर के कुछ इलाकों में नजर आएगा। भारत, नेपाल, श्रीलंका और मध्य-पूर्व के कई देशों में यह दिखाई नहीं देगा क्योंकि उस समय सूर्य क्षितिज के नीचे होगा। चूंकि भारत में यह ग्रहण दृश्य नहीं होगा, इसलिए पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार सूतक काल प्रभावी नहीं माना जाएगा और सामान्य दिनचर्या जारी रहेगी।

अनुलर सूर्य ग्रहण क्या होता है?

जब चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच आ जाता है, लेकिन उसकी दूरी ज्यादा होने के कारण वह सूर्य को पूरी तरह ढक नहीं पाता, तब सूर्य के किनारों पर रोशनी की चमकदार रिंग बन जाती है। यही दृश्य “Ring of Fire” कहलाता है। यह पूर्ण सूर्य ग्रहण से अलग होता है, क्योंकि इसमें सूर्य पूरी तरह अंधकारमय नहीं होता।

पौराणिक मान्यता: राहु-केतु की कथा

हिंदू परंपराओं में सूर्य ग्रहण का संबंध राहु-केतु से जोड़ा जाता है। समुद्र मंथन की कथा के अनुसार एक असुर ने देवताओं का रूप धारण कर अमृत पी लिया था। जब उसकी पहचान उजागर हुई तो भगवान विष्णु ने उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।

अमृत पी लेने के कारण वह अमर हो गया। उसका सिर ‘राहु’ और धड़ ‘केतु’ कहलाया। मान्यता है कि राहु समय-समय पर सूर्य और चंद्रमा को ग्रसने की कोशिश करता है, जिससे ग्रहण की स्थिति बनती है। यह कथा ग्रहण को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व प्रदान करती है।
 

Related Story

img title
img title

Be on the top of everything happening around the world.

Try Premium Service.

Subscribe Now!