Edited By Mansa Devi,Updated: 08 Jan, 2026 08:07 PM

भारतीय रेलवे लगातार नई तकनीकों के जरिए वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान मजबूत कर रहा है। वंदे भारत और वंदे भारत स्लीपर ट्रेन के बाद अब रेलवे एक और ऐतिहासिक कदम उठाने जा रहा है। जल्द ही देश की पहली हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेन का ट्रायल शुरू होने वाला है।
नेशनल डेस्क: भारतीय रेलवे लगातार नई तकनीकों के जरिए वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान मजबूत कर रहा है। वंदे भारत और वंदे भारत स्लीपर ट्रेन के बाद अब रेलवे एक और ऐतिहासिक कदम उठाने जा रहा है। जल्द ही देश की पहली हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेन का ट्रायल शुरू होने वाला है। खास बात यह है कि यह ट्रेन न डीजल से चलेगी और न ही बिजली से, बल्कि पानी से बनने वाली हाइड्रोजन गैस से संचालित होगी।
रेल मंत्रालय के अनुसार, हरियाणा के जींद में स्थापित हाइड्रोजन प्लांट में ट्रेन के टैंकों में हाइड्रोजन भरने की टेस्टिंग शुरू हो चुकी है। इस प्लांट को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यहां हाइड्रोजन का उत्पादन, भंडारण और रिफिलिंग तीनों कार्य आधुनिक तकनीक के जरिए किए जा सकें। अधिकारियों का कहना है कि शुरुआती तकनीकी परीक्षण पूरी तरह सुरक्षित और सफल रहे हैं, जिससे ट्रैक पर ट्रेन दौड़ाने का रास्ता साफ हो गया है।
हाइड्रोजन टैंकों की टेस्टिंग सफल
रेलवे अधिकारियों के मुताबिक, प्लांट में ट्रेन के सभी हाइड्रोजन सिलेंडरों में तय मानकों के अनुसार गैस भरी गई और प्रेशर की जांच की गई। ट्रेन में कुल 27 हाइड्रोजन सिलेंडर लगाए गए हैं। प्रत्येक सिलेंडर की क्षमता 8.4 किलोग्राम हाइड्रोजन गैस की है। इस तरह ट्रेन में एक बार में कुल 226.8 किलोग्राम हाइड्रोजन भरी जा सकती है। रेलवे का दावा है कि 360 किलोग्राम हाइड्रोजन से यह ट्रेन लगभग 180 किलोमीटर की दूरी तय कर सकेगी।
जींद-सोनीपत रूट पर होगा पहला पायलट प्रोजेक्ट
देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का पायलट प्रोजेक्ट हरियाणा के जींद–सोनीपत रूट पर किया जाएगा, जिसकी लंबाई लगभग 90 किलोमीटर है। अंतिम चरण की रिफिलिंग टेस्टिंग पूरी हो चुकी है और अब जनवरी 2026 में ट्रायल रन शुरू होने की संभावना जताई जा रही है। यह ट्रेन दुनिया की सबसे लंबी और सबसे शक्तिशाली ब्रॉड गेज हाइड्रोजन ट्रेन मानी जा रही है।
पर्यावरण संरक्षण है रेलवे का उद्देश्य
रेलवे मंत्रालय का कहना है कि हाइड्रोजन ट्रेन चलाने का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण है। इस ट्रेन से कार्बन उत्सर्जन शून्य होगा। इसी वजह से भविष्य में इस इंजन का उपयोग पहाड़ी और हेरिटेज रूट्स पर किए जाने की योजना है, जैसे कालका-शिमला मार्ग, ताकि संवेदनशील क्षेत्रों में प्रदूषण को रोका जा सके।
2030 तक जीरो कार्बन का लक्ष्य
भारतीय रेलवे 2030 तक जीरो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य की दिशा में काम कर रहा है। देशभर में रेल लाइनों का तेजी से इलेक्ट्रिफिकेशन किया जा रहा है और वैकल्पिक ईंधन के रूप में हाइड्रोजन को अपनाया जा रहा है। हाइड्रोजन ट्रेन का ट्रायल इसी दीर्घकालिक योजना का हिस्सा है।
दुनिया के कई देशों से बेहतर होगी भारतीय हाइड्रोजन ट्रेन
रेल मंत्रालय के अनुसार, भारत में चलने वाली हाइड्रोजन ट्रेन जर्मनी, फ्रांस और स्वीडन जैसे देशों में चल रही ट्रेनों से तकनीकी रूप से अधिक उन्नत होगी। इसके लिए इन देशों की हाइड्रोजन ट्रेनों का विस्तृत अध्ययन किया गया है, ताकि उनकी नवीनतम तकनीकों को भारतीय ट्रेन में शामिल किया जा सके। देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन की कमर्शियल रनिंग की तैयारी 2028 तक पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है।
भारत में हाइड्रोजन कारों की भी तैयारी
दुनिया के कई देशों में हाइड्रोजन कारें पहले से सड़कों पर उतर चुकी हैं। जापान और दक्षिण कोरिया इस क्षेत्र में सबसे आगे हैं, जहां सरकारें हाइड्रोजन वाहनों को बढ़ावा दे रही हैं और अलग से रिफिलिंग स्टेशन भी बनाए गए हैं। अमेरिका और यूरोप के कुछ देशों में भी हाइड्रोजन कारों का सीमित उपयोग हो रहा है। भारत में भी हाइड्रोजन कारों को लेकर तैयारी तेज हो गई है और कई कंपनियां इसके ट्रायल कर रही हैं। भारतीय रेलवे की हाइड्रोजन ट्रेन न केवल तकनीकी क्रांति का प्रतीक बनेगी, बल्कि देश को हरित और स्वच्छ परिवहन की दिशा में भी एक बड़ा कदम आगे ले जाएगी।