Human Organs Alive After Death: इंसान की मौत के बाद सबसे देर तक जिंदा रहता है कौन सा अंग? जानिए चौंकाने वाला जवाब

Edited By Updated: 31 Jan, 2026 10:25 AM

which organ remains alive the longest after a persons death

medical science की दुनिया में जीवन और मृत्यु के बीच की लकीर उतनी सीधी नहीं है जितनी हमें दिखाई देती है। आम धारणा यह है कि धड़कन थमते ही जीवन का अंत हो जाता है, लेकिन हकीकत में शरीर के भीतर के कलपुर्जे एक साथ हार नहीं मानते। मौत के सन्नाटे के बाद भी...

नेशनल डेस्क: medical science की दुनिया में जीवन और मृत्यु के बीच की लकीर उतनी सीधी नहीं है जितनी हमें दिखाई देती है। आम धारणा यह है कि धड़कन थमते ही जीवन का अंत हो जाता है, लेकिन हकीकत में शरीर के भीतर के कलपुर्जे एक साथ हार नहीं मानते। मौत के सन्नाटे के बाद भी जिस्म के कुछ हिस्से घंटों तक सांस लेते रहते हैं और ऑक्सीजन की अपनी आखिरी बूंदों के सहारे काम करने की कोशिश करते हैं। अंगों की यह 'आफ्टरलाइफ' ही वह उम्मीद है, जो किसी एक की अंतिम विदाई को किसी दूसरे के लिए नवजीवन का वरदान बना देती है।

मानव शरीर का हर हिस्सा अपनी बनावट और जरूरत के हिसाब से अलग-अलग गति से दम तोड़ता है। Heart जैसे संवेदनशील अंग को निरंतर ऑक्सीजन चाहिए होती है, इसलिए वह शरीर छोड़ने के बाद महज 4 से 6 घंटों तक ही सक्रिय रह पाता है। वहीं हमारे फेफड़े करीब 8 घंटे तक अपनी क्षमता बनाए रखते हैं और लीवर जैसा मेहनती अंग 12 घंटों तक सुरक्षित रह सकता है। आंखों की रोशनी को भी 6 घंटों के भीतर सहेजा जा सकता है, जबकि हमारी त्वचा एक पूरे दिन यानी 24 घंटे तक जीवित रहने का सामर्थ्य रखती है। यह समय सीमा ही तय करती है कि डॉक्टर कितनी फुर्ती से किसी अंग को दूसरे शरीर में भेजने की तैयारी कर सकते हैं।

इस दौड़ में अगर कोई अंग सबसे ज्यादा जिद्दी और टिकाऊ साबित होता है, तो वह है हमारी Kidney। डॉक्टरों के मुताबिक, किडनी मौत के बाद भी करीब 24 से 36 घंटों तक कार्यक्षम बनी रह सकती है। इसकी यही सहनशीलता किडनी ट्रांसप्लांट को दुनिया भर में सबसे अधिक सफल और प्रचलित बनाती है। रक्त को शुद्ध करने वाली यह 'फिल्टर मशीन' सही मेडिकल देखरेख और तापमान में लंबे समय तक अपना वजूद बचाए रखने में माहिर है। यही वजह है कि अंग दान की प्रक्रिया में किडनी को सबसे भरोसेमंद साथी माना जाता है।

अंगों के इस तरह जीवित रहने के पीछे कई बाहरी परिस्थितियां भी अहम भूमिका निभाती हैं। मौत की वजह क्या थी, उस वक्त आसपास का तापमान कैसा था और डॉक्टरों ने कितनी जल्दी अंगों को सुरक्षित वातावरण मुहैया कराया, ये सभी कारक अंगों की उम्र तय करते हैं। अंगों का यह 'बोनस लाइफस्पैन' ही अंग ट्रांसप्लांट की बुनियाद है, जिसके जरिए एक मृत व्यक्ति खामोशी से कई लोगों की जिंदगी में उजाला कर सकता है। विज्ञान की यह उपलब्धि हमें सिखाती है कि अंत के बाद भी एक नई शुरुआत की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है।


 

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