बच्चों द्वारा किया गया एक्सीडेंट मां-बाप को क्यों भुगतना पड़ता है? जानें कानून की बात

Edited By Updated: 18 Feb, 2026 08:09 PM

why do parents have to suffer for accidents caused by their children

दिल्ली के द्वारका इलाके में हाल ही में हुए एक दर्दनाक हादसे ने पूरे शहर को हिला दिया। तेज रफ्तार स्कॉर्पियो चला रहे एक नाबालिग ने बाइक सवार 23 साल के युवक को टक्कर मार दी, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। बताया जा रहा है कि कार चला रहा किशोर स्पीड...

नेशनल डेस्क : दिल्ली के द्वारका इलाके में हाल ही में हुए एक दर्दनाक हादसे ने पूरे शहर को हिला दिया। तेज रफ्तार स्कॉर्पियो चला रहे एक नाबालिग ने बाइक सवार 23 साल के युवक को टक्कर मार दी, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। बताया जा रहा है कि कार चला रहा किशोर स्पीड रिकॉर्ड करने की कोशिश कर रहा था। इसी दौरान उसने वाहन से नियंत्रण खो दिया और यह हादसा हो गया।

हादसे के बाद बड़ा सवाल यह उठा कि जब गाड़ी नाबालिग चला रहा था, तो उसके पिता के खिलाफ कार्रवाई क्यों की जा रही है? पुलिस ने पिता के खिलाफ भी चार्जशीट दायर करने की बात कही है। ऐसे मामलों में कानून सिर्फ ड्राइवर को नहीं, बल्कि जिम्मेदारी तय करने की पूरी प्रक्रिया को देखता है।

कानून क्या कहता है? अभिभावक क्यों माने जाते हैं जिम्मेदार?

भारत में अगर कोई नाबालिग वाहन चलाते हुए पकड़ा जाता है या किसी हादसे में शामिल होता है, तो मामला मोटर व्हीकल एक्ट के तहत दर्ज किया जाता है। इस कानून की धारा 199A के अनुसार, अगर नाबालिग वाहन चलाता है, तो उसकी जिम्मेदारी उसके अभिभावक या वाहन मालिक पर मानी जाती है।

कानून का साफ नजरिया है कि कम उम्र का व्यक्ति ड्राइविंग के लिए कानूनी रूप से योग्य नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि वाहन उसकी पहुंच में कैसे आया। अगर जांच में यह साबित हो जाए कि: वाहन जानबूझकर नाबालिग को दिया गया था, या निगरानी में लापरवाही बरती गई, तो अभिभावक के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई हो सकती है।

क्या हो सकती है सजा?

ऐसे मामलों में:

  • तीन साल तक की सजा हो सकती है
  • जुर्माने का प्रावधान है
  • वाहन का रजिस्ट्रेशन सस्पेंड या रद्द किया जा सकता है

इसका उद्देश्य सिर्फ सजा देना नहीं, बल्कि परिवारों को जिम्मेदार बनाना है, ताकि नाबालिगों को वाहन चलाने से रोका जा सके।

हर मामले में तुरंत गिरफ्तारी क्यों नहीं होती?

कानून सख्त जरूर है, लेकिन हर केस में तुरंत गिरफ्तारी जरूरी नहीं होती। जांच एजेंसियां पहले पूरी परिस्थिति को समझती हैं। जांच के दौरान यह देखा जाता है:

  • क्या अभिभावक ने खुद गाड़ी की चाबी दी थी?
  • या नाबालिग ने बिना जानकारी के वाहन निकाल लिया?
  • क्या पहले भी ऐसी घटना हो चुकी थी?
  • क्या परिवार ने बच्चे को रोकने की कोशिश की थी?

कई मामलों में माता-पिता यह दलील देते हैं कि उन्हें पता ही नहीं था कि बच्चा गाड़ी लेकर बाहर गया है। अगर जांच में सीधी लापरवाही साबित नहीं होती, तो गिरफ्तारी से राहत मिल सकती है। हालांकि जुर्माना और कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ सकता है।

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