Edited By ,Updated: 14 Sep, 2015 01:48 PM

भवन किसी भी आकार-प्रकार का क्यों न हो किन्तु उस पर छत तो देनी ही होती है। आजकल अनेक प्रकार की छतों का निर्माण हो रहा है जिसमें समतल छत, गोल गुम्बद के आकार वाली छत,
भवन किसी भी आकार-प्रकार का क्यों न हो किन्तु उस पर छत तो देनी ही होती है। आजकल अनेक प्रकार की छतों का निर्माण हो रहा है जिसमें समतल छत, गोल गुम्बद के आकार वाली छत, सपाट छत, ढलान वाली छत तथा पिरामिड के आकार वाली छतों की प्रमुखता दिखाई देती है।
छतों के आकार इस बात पर निर्भर करते हैं कि उस स्थान का प्राकृतिक वातावरण किस प्रकार का है। अगर कश्मीर जैसे हिमपात वाले स्थान पर समतल छत दी जाए तो उस भवन पर साल भर बर्फ जमा रहेगी, अत: वहां के वातावरण के अनुसार ढलान वाली या गुम्बदनुमा छत देना अनिवार्य है।
वास्तुशास्त्र के अनुसार छत का आकार कैसा हो जिससे उस भवन पर भी किसी भी प्रकार के अमंगल की छाया न पड़े, इस विषय में विचार करना आवश्यक है। किसी भी भवन की सुंदरता छत से ही परिलक्षित होती है। अत: वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुसार छत की सुंदरता में भी किसी प्रकार की कमी न होने पाए इसका ध्यान रखना भी आवश्यक है।
वास्तुविदों के अनुसार मकान की छत पिरामिड या मंदिर की छतों के समान नहीं होनी चाहिए। असमतल छत भी आकृति दोष के अंतर्गत ही मानी जाती है। अत: इस तरह की छतों वाले मकान दोषपूर्ण ही माने जाते हैं।
भवन की छत के बीच किसी भी प्रकार का गड्ढा दोषपूर्ण माना जाता है अत: छत के बीच का हिस्सा चारों ओर की अपेक्षा थोड़ा उठा हुआ अवश्य होना चाहिए। कुछ भवन ऐसे भी होते हैं जिनकी छतों के बीम दिखाई देते हैं। इस प्रकार के दिखाई देने वाले बीमों से अनेक प्रकार के हानिकारक प्रभाव होते हैं। वास्तुशास्त्र के अनुसार इन बीमों के नीचे बैठने, रहने, सोने अथवा अन्य कोई कार्य करने से व्यक्ति विशेष के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। अनेक बार ऐसे बीम को छिपाने के लिए ‘फाल्स सीलिंग’ करनी पड़ती है।
कुछ लोग भवन के कमरों की भीतरी छतों पर अपने मन के अनुसार ही गहरा नीला, गुलाबी, सिंदूरी लाल, गहरा लाल, नीला, काला रंग करवा लेते हैं। इन रंगों का दुष्प्रभाव घर में रहने वालों पर पड़ता है। घर की छत में अंदरुनी भाग पर सफेद, आसमानी, हल्का नीला रंग ही करवाना श्रेयस्कर है।
छत की बीम उत्तर-दक्षिण दिशा में देने से यह भवन में रहने वालों पर तनाव डालता है। कुछ लोग मकान के अंदर रबड़, नायलॉन, रैक्सिन, फोम, प्लास्टिक आदि का इस्तेमाल करते हैं। वास्तुशास्त्र के अनुसार छत वाले भाग पर इनसे बनी वस्तुओं को नहीं लगाना चाहिए क्योंकि इनके प्रयोग से उस भवन में हमेशा बीमारियों का डेरा बना रहता है।
कुछ भवनों में अधिकांशत: लोहे एवं एस्बैस्टस की चादरों की छतें होती हैं। भीतरी छतों का निर्माण तापरोधी वस्तुओं की शीट्स से ही करना चाहिए। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि भीतरी छतों को समतल कर दिया जाए। एस्बैस्टस के नीचे लकड़ी के पटरों की एक अन्य छत बनवा देनी चाहिए।
कमरों की भीतरी छत का रंग डिजाइन फर्श की तुलना में हल्का होना चाहिए तथा छत के केंद्रीय स्थान में प्रकाश की व्यवस्था करनी चाहिए। अगर कमरा बड़ा हो तो छत के केंद्र के अतिरिक्त पूर्व एवं पश्चिम दिशा से भी प्रकाश की व्यवस्था कर देनी चाहिए। झाड़-फानूस तथा पंखों को बराबर दूरी पर छत में टांगना चाहिए। इस संतुलित व्यवस्था से मानसिक संतुलन बना रहता है।
छत के अंदरुनी भाग को सजाने के लिए कुछ लोग उसमें कील आदि ठोक दिया करते हैं। वास्तुशास्त्र के अनुसार छत में कील ठोकना दोषपूर्ण माना जाता है। आतंरिक सुंदरता को बढ़ाने के दृष्टिकोण से दुगुनी सीलिंग की ऊंचाई या फाल्स सीलिंग की व्यवस्था करना भी वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुसार वर्जित माना जाता है।