Edited By ,Updated: 06 Jan, 2026 05:48 AM

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बीती रात के घटनाक्रम ने विश्व शक्ति संतुलन, अंतरराष्ट्रीय कानून और भू-राजनीतिक नैतिकता तीनों को एक साथ कठघरे में खड़ा कर दिया है। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की घोषणा के अनुसार अमरीका द्वारा वेनेजुएला में सैन्य...
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बीती रात के घटनाक्रम ने विश्व शक्ति संतुलन, अंतरराष्ट्रीय कानून और भू-राजनीतिक नैतिकता तीनों को एक साथ कठघरे में खड़ा कर दिया है। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की घोषणा के अनुसार अमरीका द्वारा वेनेजुएला में सैन्य कार्रवाई करते हुए राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को गिरफ्तार कर न्यूयॉर्क ले जाया गया है। अमरीकी प्रशासन का दावा है कि मादुरो दंपति ड्रग तस्करी और तथाकथित ‘नार्को-टेररिज्म’ में संलिप्त थे। वेनेज़ुएला सरकार ने इस कार्रवाई को खुला विदेशी आक्रमण बताते हुए अपनी संप्रभुता का घोर उल्लंघन करार दिया है। देश के उपराष्ट्रपति और सैन्य नेतृत्व ने इसे युद्ध जैसी स्थिति बताते हुए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपात बैठक बुलाने की मांग की है। इस एक घटना ने पूरी दुनिया को 2 स्पष्ट धड़ों में बांट दिया है।
अमरीकी कार्रवाई पर रूस और चीन ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे ‘सशस्त्र आक्रमण’ और ‘अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन’ बताया है। रूस ने चेताया कि यह कदम वैश्विक स्थिरता के लिए गंभीर खतरा है, जबकि चीन ने इसे शक्ति प्रदर्शन की राजनीति करार दिया। उत्तर कोरिया ने तो यहां तक कह दिया कि ऐसी घटनाएं तीसरे विश्व युद्ध की भूमिका बन सकती हैं। इसके विपरीत अर्जेंटीना जैसे कुछ देशों ने अमरीकी कार्रवाई को कानून-व्यवस्था की जीत बताया है। ब्रिटेन और अधिकांश यूरोपीय देश फिलहाल संयम की भाषा बोलते हुए अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीतिक समाधान पर जोर दे रहे हैं।
अपहरण, लाइव निगरानी और भय का संदेश : इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि एक संप्रभु देश के निर्वाचित राष्ट्रपति को उसके ही देश में घुसकर गिरफ्तार किया गया। उनका अपहरण कर अमरीका ले जाया गया और इस पूरी प्रक्रिया को अमरीकी राष्ट्रपति ने लाइव देखा। यह महज एक गिरफ्तारी नहीं, बल्कि शक्ति के खुले प्रदर्शन का वह दृश्य है, जो जानबूझकर रचा गया प्रतीत होता है। यह कार्रवाई केवल मादुरो के विरुद्ध नहीं, बल्कि विश्व के उन तमाम नेताओं के लिए एक चेतावनी है, जो अमरीकी नीतियों से असहमति रखते हैं। संदेश साफ है- ‘हम चाहें तो किसी भी सीमा तक जा सकते हैं।’ अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भय को हथियार बनाने की यह प्रवृत्ति निंदनीय है और वैश्विक लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरनाक संकेत भी।
ऐतिहासिक संदर्भ-ईराक से वेनेजुएला तक : इस घटना की तुलना 2003 के ईराक आक्रमण से करना स्वाभाविक है। तब अमरीका ने सद्दाम हुसैन पर सामूहिक विनाश के हथियार छिपाने का आरोप लगाया था। बाद में वे हथियार कभी नहीं मिले लेकिन सद्दाम को पकड़कर फांसी दे दी गई। उस समय भी पूरी प्रक्रिया को सार्वजनिक किया गया था ताकि दुनिया देखे और डरे। आज वेनेजुएला में वही पैटर्न दोहराया जाता दिखता है। फर्क बस इतना है कि इस बार आरोपों से पहले कार्रवाई हो चुकी है और न्याय से पहले शक्ति का प्रदर्शन।
अंतरराष्ट्रीय कानून और नैतिक प्रश्न : संयुक्त राष्ट्र चार्टर स्पष्ट करता है कि किसी संप्रभु देश पर सैन्य कार्रवाई तभी वैध है, जब सुरक्षा परिषद की अनुमति हो या आत्मरक्षा की स्थिति हो। अमरीका इस कार्रवाई को अपराध-रोधी अभियान बता रहा है लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानूनविदों और राजनयिकों के बीच यह सवाल गूंज रहा है कि क्या कोई देश स्वयं न्यायाधीश, अभियोजक और जल्लाद तीनों बन सकता है? यदि यही वैश्विक मानक बन गया तो अंतरराष्ट्रीय कानून की प्रासंगिकता केवल किताबों तक सिमट कर रह जाएगी।
तेल, रणनीति और असली कारण : वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित तेल भंडार है। वर्षों से अमरीका वहां आॢथक प्रतिबंधों और राजनीतिक दबाव की नीति अपनाए हुए है। मादुरो सरकार पर कार्रवाई को केवल कानून का पालन बताना भोलेपन से कम नहीं। ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण और लातिन अमरीका में रणनीतिक वर्चस्व। इस पूरी कहानी के मूल में यही कारण अधिक स्पष्ट दिखाई देते हैं। रूस और चीन की वेनेजुएला में बढ़ती उपस्थिति ने अमरीका की ङ्क्षचता और आक्रामकता दोनों को बढ़ाया है।
भारतीय संदर्भ : अमरीका को भारत और रूस के बीच तेल तथा रणनीतिक सहयोग लंबे समय से नागवार गुजरता रहा है। यूक्रेन युद्ध के बाद भी भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए रूसी तेल की खरीद जारी रखी, जिसे लेकर वाशिंगटन में असहजता साफ देखी गई लेकिन भारत कोई कमजोर या आश्रित राष्ट्र नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जिसकी विदेश नीति आत्मसम्मान और संतुलन पर आधारित रही है। भारत की नेतृत्व क्षमता मजबूत है और निर्णय किसी दबाव या धमकी के आधार पर नहीं लिए जाते। ऐसे में यदि वैश्विक शक्ति प्रदर्शन के जरिए भारत जैसे देशों को डराने या झुकाने की कोशिश की जाती है, तो वह व्यर्थ सिद्ध होगी। भारत ने बार-बार साबित किया है कि वह मित्रता निभाता है लेकिन संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों पर कोई समझौता नहीं करता।
तीसरे विश्व युद्ध की आशंका : हालांकि अभी इसे सीधे तीसरे विश्व युद्ध की शुरुआत कहना अतिशयोक्ति होगी लेकिन इतना तय है कि अमरीका का यह एकतरफा कदम वैश्विक तनाव को खतरनाक स्तर तक ले जा सकता है। यदि हर महाशक्ति इसी तरह अपने हितों की रक्षा के नाम पर दूसरे देशों में घुसपैठ करेगी, तो दुनिया अराजकता की ओर बढ़ेगी।
निष्कर्ष : अमरीका का वेनेजुएला ऑप्रेशन केवल एक राष्ट्रपति की गिरफ्तारी नहीं, यह शक्ति, भय, अंतरराष्ट्रीय कानून, ऊर्जा राजनीति और वैश्विक संतुलन, सबका एक साथ परीक्षण है। मादुरो दोषी हैं या नहीं, यह तय करने का अधिकार अदालतों का होना चाहिए, किसी एक देश की सेना का नहीं। यह घटना एक खबर भर नहीं, बल्कि आने वाले समय की उस वैश्विक राजनीति का संकेत है, जहां कानून कमजोर और ताकत निर्णायक होती जा रही है। ऐसी प्रवृत्तियों की निंदा जरूरी है क्योंकि आज वेनेजुएला है, कल कोई और देश भी हो सकता है।-बालकृष्ण थरेजा