भारत में 4 करोड़ से ज्यादा बच्चे मोटापे का शिकार, दुनिया में दूसरे स्थान पर पहुंचा देश

Edited By Updated: 05 Mar, 2026 03:14 AM

over 40 million children in india are obese

‘वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस 2026'की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत बच्चों में मोटापे के मामले में अब अमेरिका से भी आगे निकल चुका है और चीन के बाद दुनिया में दूसरे स्थान पर है।

नई दिल्लीः ‘वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस 2026'की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत बच्चों में मोटापे के मामले में अब अमेरिका से भी आगे निकल चुका है और चीन के बाद दुनिया में दूसरे स्थान पर है। वर्ष 2025 तक के आंकड़ों के आधार पर इस रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि भारत में 5 से 19 साल के करीब 4.1 करोड़ बच्चों का वजन सामान्य से ज्यादा है, उनमें से 1.4 करोड़ बच्चे तो गंभीर मोटापे की श्रेणी में आते हैं। 

चीन इस सूची में सबसे ऊपर है, जहां 6.2 करोड़ बच्चों का वजन सामान्य से अधिक है या उनका शरीर द्रव्यमान सूचकांक (बीएमआई) ज्यादा है। भारत दूसरे और अमेरिका तीसरे स्थान पर है। अमेरिका में 2.7 करोड़ बच्चे बढ़े हुए वजन या उच्च बीएमआई का शिकार हैं और 1.3 करोड़ मोटापे के साथ जी रहे हैं। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि साल 2040 तक दुनिया भर में ऐसे बच्चों की संख्या 50 करोड़ से ज्यादा हो सकती है। 

अकेले भारत में अगले 15 सालों में उच्च शरीर द्रव्यमान सूचकांक वालों की संख्या बढ़कर 5.6 करोड़ होने का अनुमान है, जिनमें से 2 करोड़ मोटापे की श्रेणी में आ जाएंगे। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह स्थिति बहुत चिंताजनक है। बचपन में अधिक वजन होने से न केवल बड़े होने पर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है, बल्कि कम उम्र में ही गंभीर बीमारियां होने की संभावना भी बढ़ जाती है। 5 से 19 साल के बच्चों में हाई ब्लड प्रेशर, शुगर बढ़ना और खून में चर्बी (ट्राइग्लिसराइड्स) बढ़ने जैसी समस्याएं देखी जा रही हैं, जो आगे चलकर मधुमेह और दिल की बीमारियों का कारण बनती हैं। एटलस के अनुमान के अनुसार उच्च बीएमआई के कारण उच्च रक्तचाप से पीड़ति बच्चों की संख्या 29 लाख से बढ़कर 42 लाख से ज्यादा हो सकती है। 

हाइपरग्लाइसेमिया के मामले 13 लाख से बढ़कर 19 लाख होने का अनुमान है, जबकि उच्च ट्राइग्लिसराइड्स वाले बच्चों की संख्या 43 लाख से बढ़कर 60 लाख हो सकती है। रिपोटर् में इस बढ़ते मोटापे की वजह बताते हुए कहा गया है कि 11 से 17 साल के करीब 74 प्रतिशत किशोर उतनी शारीरिक मेहनत या खेलकूद नहीं करते जितनी जरूरत है। स्कूल जाने वाले केवल 35.5 प्रतिशत बच्चों को ही स्कूल में भोजन मिल पाता है। इसके अतिरिक्त, पांच महीने तक के 32.6 प्रतिशत शिशुओं को मां का दूध पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाता। 15-49 आयु वर्ग की महिलाओं में से 13.4 प्रतिशत उच्च बीएमआई से पीड़ति हैं और 4.2 प्रतिशत टाइप 2 मधुमेह से ग्रसित हैं, ये कारक भी बचपन के स्वास्थ्य परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। 

विश्व मोटापा महासंघ ने चेतावनी दी है कि आने वाली पीढि़यों को बचाने के लिए तुरंत ठोस कदम उठाने की जरूरत है। स्कूलों में सेहतमंद खाने को बढ़ावा देना, जंक फूड के विज्ञापनों पर रोक लगाना और मीठे पेय पदार्थों पर टैक्स बढ़ाने जैसे फैसले लेने होंगे। समय पर जांच और शुरुआती इलाज से ही इस खतरे को कम किया जा सकता है। हालांकि दुनिया भर में बच्चों के मोटापे को रोकने का लक्ष्य 2030 तक बढ़ा दिया गया है, लेकिन भारत समेत ज्यादातर देश फिलहाल इस लक्ष्य से काफी पीछे हैं। 

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