Edited By ,Updated: 31 Oct, 2026 06:00 AM

‘‘सुप्रभात, सर! मैं एक पत्रकार हूं और आपके विभाग द्वारा बनाए गए पुल की जांच कर रहा हूं।’’ ‘‘बहुत बढिय़ा! क्या इसने कोई पुरस्कार जीता है?’’ ‘‘यह नदी में गिर गया है, सर।
‘‘सुप्रभात, सर! मैं एक पत्रकार हूं और आपके विभाग द्वारा बनाए गए पुल की जांच कर रहा हूं।’’ ‘‘बहुत बढिय़ा! क्या इसने कोई पुरस्कार जीता है?’’ ‘‘यह नदी में गिर गया है, सर। लेकिन अनुबंध के बारे में लिखने से पहले, मैंने सोचा कि मुझे आपकी सहमति ले लेनी चाहिए।’’
वहां एक विचारशील सन्नाटा छा गया। दूसरी तरफ कहीं, मैंने कल्पना की कि एक कुर्सी को मेज के थोड़ा और करीब खींचा जा रहा है। यहां, आखिरकार, एक ऐसा पत्रकार था जो समझता था कि प्रैस और सत्ता के बीच एक स्वस्थ संबंध कैसे काम करना चाहिए।
‘‘आप वास्तव में क्या प्रकाशित करना चाहते हैं?’’ ‘‘स्वीकृत राशि, खर्च की गई राशि और आपके भाई की कंपनी को यह अनुबंध कैसे मिला।’’ ‘‘मेरा भाई एक निजी व्यक्ति है।’’ ‘‘उसने एक सार्वजनिक पुल बनाया।’’
‘‘हां, लेकिन उसने ऐसा बहुत निजी तौर पर किया।’’
यह काल्पनिक बातचीत तब याद आई, जब मैंने पढ़ा कि 21 समाचार प्रकाशकों ने भारत के निजता कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। उनका तर्क है कि इसकी सहमति संबंधी आवश्यकताएं पत्रकारिता में बाधा डाल सकती हैं। सरकार का कहना है कि वह उनकी चिंताओं को सुनने के लिए तैयार है। अब, निजता सुरक्षा की हकदार है। किसी को भी बैडरूम की खिड़की से झांकने वाले या मनोरंजन के लिए किसी मरीज के मैडिकल रिकॉर्ड प्रकाशित करने वाले रिपोर्टर की जरूरत नहीं है। लेकिन जब जनता का पैसा निजी जेबों में जाता है, तो निश्चित रूप से उस यात्रा के लिए एक यात्रा संवाददाता तो होना ही चाहिए। ‘‘सर, क्या हम गड्ढे की तस्वीर ले सकते हैं?’’ ‘‘बिल्कुल।’’ ‘‘और यह उल्लेख कर सकते हैं कि इसकी मुरम्मत के लिए किसे भुगतान किया गया था।’’
‘‘अब आप दखलंदाजी कर रहे हैं।’’ मैं एक न्यूजरूम की कल्पना कर सकता हूं, जहां अकाऊंट्स और विज्ञापन के बगल में एक नया विभाग हो। सहमति। सैंकड़ों विनम्र युवा कर्मचारी उन लोगों को फोन कर रहे हैं, जिनकी गतिविधियां पहले पन्ने पर छपने वाली हैं। ‘‘मैडम, हमारे पास ऐसे दस्तावेज हैं जो बताते हैं कि आपके संगठन ने राहत कोष का दुरुपयोग किया है।’’ ‘‘कितना दुखद है!’’‘‘हां, मैडम।’’ ‘‘मेरे कहने का मतलब यह दुखद है कि आपके पास वे दस्तावेज हैं।’’ संपादक बेसब्री से इंतजार करता है। प्रैस तैयार खड़ी है। आखिरकार, सहमति कार्यकारी एक बेहतरीन खबर के साथ प्रवेश करता है। मौसम प्रकाशित करने की अनुमति मिल गई है, बशर्ते बादलों की पहचान न की जा सके।
सोचिए कि ऐसी व्यवस्था उस अदना-सी रिश्वत का क्या हाल करेगी। लिफाफे पर एक छोटी-सी घोषणा आ सकती है-‘‘इस लेन-देन की सामग्री व्यक्तिगत है। जनहित से किसी भी समानता के लिए गहरा खेद है।’’ इस बीच, नागरिक मोजे खरीदने के लिए अपना फोन नंबर, लंच ऑर्डर करने के लिए अपना जन्मदिन और भूला हुआ पासवर्ड वापस पाने के लिए अपने पूरे परिवार का इतिहास देना जारी रखता है। उसकी निजता उल्लेखनीय रूप से समझौतावादी लगती है। लेकिन जैसे ही वह पूछता है कि उसके टैक्स का पैसा कहां गया, गोपनीयता अचानक पवित्र हो जाती है। संपादकों को सुनने के लिए मंत्री की तत्परता स्वागत योग्य है। उम्मीद है कि उस चर्चा से जनता की सेवा करने वाली पत्रकारिता के लिए स्पष्ट सुरक्षा सामने आएगी।
हमारे काल्पनिक पुल पर लौटते हैं, आखिरकार अधिकारी का फोन आता है। ‘‘आपको प्रकाशित करने की मेरी अनुमति है।’’ ‘‘जांच को?’’‘‘नहीं। चिंता व्यक्त करने वाले मेरे बयान को।’’‘‘और वह गायब पैसा?’’ ‘‘कृपया उसकी निजता का सम्मान करें।’’ मैंने फोन रखा और टूटे हुए पुल की तस्वीर देखी। उसके नीचे, ग्रामीण काम पर जाने के लिए नदी से होकर गुजर रहे थे, अपने जूतों को पानी से ऊपर उठाए हुए। उनका पैसा खर्च किए जाने से पहले उनसे सहमति नहीं मांगी गई थी।शायद किसी को शुरुआत उनसे करनी चाहिए, हमारे साथ...!-दूर की कौड़ी