कांग्रेस ने कर्नाटक में अपने पत्ते अच्छे खेले

Edited By Updated: 23 May, 2023 05:00 AM

congress played its cards well in karnataka

एक विशेष पल में किस्मत प्रत्येक राजनीतिक दल पर मेहरबान होती है। 187 वर्षीय वैभवशाली पुरानी कांग्रेस पार्टी, जिसने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, कोई अपवाद नहीं है। हाल ही में समृद्ध तथा महत्वपूर्ण कर्नाटक राज्य में विजय ने कांग्रेस को वह सुनहरा पल दिया है।

एक विशेष पल में किस्मत प्रत्येक राजनीतिक दल पर मेहरबान होती है। 187 वर्षीय वैभवशाली पुरानी कांग्रेस पार्टी, जिसने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, कोई अपवाद नहीं है। हाल ही में समृद्ध तथा महत्वपूर्ण कर्नाटक राज्य में विजय ने कांग्रेस को वह सुनहरा पल दिया है। यदि कांग्रेस अपना पुनरुत्थान चाहती है तो यह अपनी हालिया विजय के भरोसे पर बैठी नहीं रह सकती। इस वर्ष के अंत में कांग्रेस को राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना तथा मिजोरम में चुनावों का सामना करना पड़ेगा और बड़ा फाइनल 2024 में लोकसभा चुनावों का होगा। क्या कांग्रेस अपनी कर्नाटक विजय को भुना पाएगी, इतिहास पर नजर डालते हुए कि कैसे दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने चिकमंगलूर पल का इस्तेमाल करके हमेशा प्रत्येक अवसर का लाभ उठाया।

पुराने लोग याद करते हैं कि कैसे इंदिरा गांधी ने आपातकाल के बाद 1978 के चिकमंगलूर उपचुनाव में विजय का इस्तेमाल एक वर्ष बाद ही, 1980 में संसद में वापसी के लिए किया। उन्होंने दोबारा सत्ता पर कब्जा कर लिया। वे यह भी याद करते हैं कि कैसे इंदिरा ने बेलची पल का इस्तेमाल अपने लाभ के लिए किया। जुलाई 1977 में बिहार में एक गैंग द्वारा 8 दलितों सहित 11 व्यक्तियों की निर्मम हत्या कर दी गई थी। वह  एक हाथी तथा एक ट्रैक्टर पर सवार होकर पीड़ितों से मिलने पहुंचीं। 

कर्नाटक इंदिरा की पुत्रवधू सोनिया गांधी के लिए भी भाग्यशाली था। उन्होंने अपना पहला चुनाव 1999 में बेल्लारी निर्वाचन क्षेत्र से जीता था जो कांग्रेस का गढ़ है। उन्होंने एक व्यावहारिक गठबंधन बनाया, 2004 में पार्टी को सत्ता में लाईं तथा 10 वर्षों तक शासन किया। वर्तमान विजय ने कांग्रेस को दो तुरंत लाभ प्राप्त करने का अवसर दिया। पहला है संगठन को पुनर्जीवित करना, जो अच्छी स्थिति में नहीं है। दूसरा है नए उत्साह के साथ विपक्ष को एकजुट करने में अग्रणी भूमिका निभाना। कांग्रेस ने रोजी-रोटी तथा स्थानीय मुद्दों को उठाकर कर्नाटक में अपने पत्ते अच्छे से खेले। इसने स्थानीय नेताओं को खुलकर काम करने की आजादी भी दी। हाईकमान ने केवल चुनाव प्रचार में सहयोग दिया। इसने लाभ प्रदान किया। 

इसके विपरीत भाजपा ने एक गलत चुनावी रणनीति अपनाई, जिसका लाभ कांग्रेस को पहुंचा। मोदी के जादुई करिश्मे पर निर्भरता तथा भाजपा के शीर्ष नेताओं द्वारा हाई वोल्टेज प्रचार ने भाजपा को सफलता में कोई विशेष सहयोग नहीं दिया। कमजोर मुख्यमंत्री बोम्मई तथा भ्रष्टाचार के अनगिनत आरोपों ने इसकी परेशानियों को और बढ़ा दिया। हिन्दुत्व तथा राम मंदिर का मुद्दा लोगों को आकॢषत नहीं कर सका। हिन्दुत्व ने केवल तटीय जिलों के भीतर काम किया। भाजपा केवल कुछ स्थानीय मुद्दे ही उठा सकी। चुनावों ने यह भी दिखाया कि दक्षिण में सफलता प्राप्त करने के लिए इसे एक अलग चुनावी नैरेटिव की जरूरत है। और भी अधिक महत्वपूर्ण कर्नाटक में पराजय का अर्थ यह है कि दक्षिण भारत में भाजपा की कोई उपस्थिति नहीं है। दक्षिण में 129 सीटें हैं जिनमें से 2019 में भाजपा ने केवल 29 जीतीं। 

कांग्रेस को कर्नाटक चुनावों से अवश्य सबक लेना चाहिए। यदि पार्टी के शीर्ष नेताओं ने नवचयनित विधायकों को अपना मुख्यमंत्री चुनने की आजादी दी होती तो यह और अधिक लोकतांत्रिक होता। इसकी बजाय विधायक दल ने सामान्य एक पंक्ति का प्रस्ताव पारित करके मुख्यमंत्री चुनने का अधिकार हाईकमान पर छोड़ दिया। दो आकांक्षी, पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया तथा प्रदेश कांग्रेस कमेटी प्रमुख डी.के. शिव कुमार  चार दिन तक दिल्ली में डटे रहे। आखिरकार सोनिया गांधी ने मुद्दे का समाधान किया। उन्होंने शिव कुमार को सत्ता की सांझेदारी के एक फार्मूले पर राजी होने के लिए मना लिया जिसमें सिद्धारमैया मुख्यमंत्री तथा शिव कुमार उपमुख्यमंत्री बनाए गए। 

दूसरे, असल परीक्षा यह होगी कि कांग्रेस कैसे 2024 के चुनावों के लिए विपक्षी गठबंधन को एकजुट रखने के लिए अपनी नई ताकत का इस्तेमाल करती है। इस संबंध में कांग्रेस ने अपने नए उत्साह का प्रदर्शन करने के लिए शनिवार को मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के शपथ ग्रहण समारोह का इस्तेमाल किया। आने वाले चुनावों में अच्छी कारगुजारी दिखाने के लिए एक संयुक्त विपक्ष को इस अवसर का अवश्य लाभ उठाना चाहिए। 19 राज्यों में करीब 209 लोकसभा सीटें हैं, जहां कांग्रेस तथा भाजपा सीधी प्रतिस्पर्धा में हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार वन-टू-वन लडऩे की बात कर रहे हैं। तीसरे, कांग्रेस ने कर्नाटक में मुसलमानों, दलितों तथा पिछड़े वर्गों के रूप में अपना खोया हुआ वोट बैंक फिर से प्राप्त कर लिया है। इसे न केवल बनाए रखा जाना चाहिए बल्कि आने वाले चुनावों में इसमें वृद्धि भी की जानी चाहिए। 

चौथे, सिद्धारमैया ने अच्छी शुरूआत की तथा वायदे के अनुसार अपनी पहली कैबिनेट मीटिंग में पांच चुनावी वायदों को लागू कर दिया। उनकी चुनौती सबको साथ लेकर चलना तथा अपने लोगों को भाजपा द्वारा शिकार किए जाने से बचाना है। उनके कल्याणकारी उपायों में सभी घरों को 200 यूनिट मुफ्त बिजली उपलब्ध करवाना, परिवार की मुखिया महिला को प्रतिमाह 2000 रुपए देना तथा गरीबी रेखा से नीचे वाले परिवार के प्रत्येक सदस्य को मुफ्त 10 किलो चावल देना शामिल हैं। 

कांग्रेस की एक अन्य सिरदर्दी है। आने वाले चुनावों से पहले इसे राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ में सत्ता के लिए संघर्ष का समाधान अवश्य  करना होगा। इसे नाजुक तरीके से संभालने की जरूरत है। पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को बदलना चाहते हैं, लेकिन गहलोत ऐसा नहीं चाहते। दोनों में से यदि किसी एक को भी पुरस्कृत किया जाता है तो दूसरा परेशानी खड़ी कर सकता है। 

ऐसी ही स्थिति छत्तीसगढ़ में है जहां मुख्यमंत्री भूपेश बघेल तथा कैबिनेट मंत्री टी.एस. सिंह देव के बीच सत्ता संघर्ष जारी है। राहुल गांधी ने 2018 में अढ़ाई वर्ष बाद मुख्यमंत्री बदलने का वायदा किया था। देव उसी बदलाव की मांग कर रहे हैं। हिमाचल प्रदेश तथा अब कर्नाटक में हालिया विजय ने कांग्रेस को दिखाया है कि पार्टी तथा विपक्ष में एकजुटता, एक मजबूत संगठन और एक आकर्षक नैरेटिव आने वाले महीनों में एक नया मंत्र होना चाहिए।-कल्याणी शंकर
     

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