डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटैक्शन एक्ट : पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर सवाल!

Edited By Updated: 30 Oct, 2026 03:53 AM

digital personal data protection act question on freedom of journalism

हाल ही में डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (डी.एन.पी.ए.) ने सुप्रीम कोर्ट में डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटैक्शन (डी.पी.डी.पी.) एक्ट 2023 और उसके नियमों 2025 के खिलाफ याचिका दायर की है। देश के 21 प्रमुख मीडिया संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाली इस याचिका...

हाल ही में डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (डी.एन.पी.ए.) ने सुप्रीम कोर्ट में डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटैक्शन (डी.पी.डी.पी.) एक्ट 2023 और उसके नियमों 2025 के खिलाफ याचिका दायर की है। देश के 21 प्रमुख मीडिया संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाली इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि कानून पत्रकारीय गतिविधियों के लिए कोई स्पष्ट छूट नहीं देता, जिससे खोजी पत्रकारिता बाधित हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी किया है और 17 नवम्बर को सुनवाई तय की है। अदालत ने इस पर किसी भी तरह की अंतरिम रोक नहीं लगाई लेकिन निजता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन की जरूरत पर जोर दिया।

उल्लेखनीय है कि इस याचिका में याचिकाकत्र्ताओं का मुख्य तर्क है कि कानून पत्रकारों, संपादकों और समाचार संगठनों को ‘डाटा फिड्यूशियरी’ मानकर नोटिस, सहमति और डाटा मिटाने जैसी बाध्यताएं लागू करता है। इस कानून की धारा 7 (वैध उपयोग) और धारा 17 (छूट) में पत्रकारिता का कोई उल्लेख नहीं है, जबकि पहले के मसौदों (2018, 2019, 2021) में ऐसी छूट थी। इसकी अनुपस्थिति का मतलब है कि किसी व्यक्ति पर रिपोर्ट लिखते समय उसकी सहमति लेनी पड़ सकती है। ऐसी खोजी रिपोर्टों में यदि संदिग्ध को पहले से सूचित किया जाए तो वह सबूत नष्ट करने, गवाहों को धमकाने या कहानी रोकने का प्रयास कर सकता है।  इसके अलावा, धारा 36 और नियम 23 के तहत सरकार बिना न्यायिक निगरानी के किसी भी डाटा फिड्यूशियरी से जानकारी मांग सकती है। याचिकाकत्र्ताओं का कहना है कि यह पत्रकारीय स्रोतों को उजागर कर सकता है। धारा 44(3) ने आर.टी.आई. अधिनियम की धारा 8(1)(जे) में संशोधन कर ‘व्यक्तिगत सूचना’ को व्यापक रूप से छूट दे दी है। पहले सार्वजनिक हित का प्रावधान था, अब वह हटा दिया गया है। इससे आर.टी.आई. के जरिए सार्वजनिक पदाधिकारियों की जानकारी हासिल करना और कठिन हो सकता है।

वहीं सरकार का आधिकारिक रुख निजता की रक्षा है। 2017 के पुट्टस्वामी फैसले के बाद निजता मौलिक अधिकार बन चुकी है। सरकार का तर्क है कि आज के डिजिटल युग में विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म और कंपनियों द्वारा डाटा के दुरुपयोग को रोकने के लिए यह कानून जरूरी माना गया। विभिन्न मीडिया संगठनों और उनके प्रतिनिधियों के साथ हुई कुछ बैठकों में मीडिया संगठनों को आश्वासन भी दिए गए कि इस कानून से प्रैस की स्वतंत्रता प्रभावित नहीं होगी। लेकिन लिखित छूट न होने और पहले के मसौदों से हटाए जाने पर सवाल उठते हैं। 
यूरोपीय संघ के जनरल डाटा प्रोटैक्शन रैगुलेशन (जी.डी.पी.आर.) के अनुच्छेद 85 में स्पष्ट कहा गया है कि सदस्य देश डाटा संरक्षण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (पत्रकारिता सहित) के बीच सामंजस्य बिठाएं। ब्राजील के सामान्य डेटा संरक्षण कानून (एल.जी.पी.डी.) और कई अन्य देशों में भी पत्रकारीय उद्देश्य के लिए छूट या संतुलित प्रावधान हैं। ये कानून निजता की रक्षा करते हैं लेकिन सार्वजनिक हित की रिपर्टिंग को रोकते नहीं। 

पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। खोजी पत्रकारिता भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग और सार्वजनिक मुद्दों को उजागर करती है। अगर हर रिपोर्ट के लिए सहमति जरूरी हो जाए, तो कई कहानियां छप ही नहीं पाएंगी। स्रोत गोपनीयता खतरे में पडऩे से व्हिसलब्लोअर और आम नागरिक भी जानकारी सांझी करने से हिचकिचाएंगे। विश्व प्रैस फ्रीडम इंडैक्स में भारत की रैंकिंग पहले से ही चिंताजनक बनी हुई है। निजता और सूचना का अधिकार दोनों मौलिक हैं और इनमें संतुलन भी जरूरी है। समाधान यह हो सकता है कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट दी जाए, जो प्रैस काऊंसिल या स्व-नियामक संहिताओं से जुड़ी हो। सार्वजनिक हित का परीक्षण, आनुपातिकता और न्यायिक निगरानी जैसी सुरक्षाएं भी रखी जाएं। डाटा मिटाने के अधिकार को प्रकाशित खबरों पर लागू न किया जाए, खासकर जब वे सार्वजनिक रिकॉर्ड बन चुकी हों।
लोकतंत्र में सत्ता की जवाबदेही तभी संभव है जब मीडिया स्वतंत्र और निष्पक्ष हो। आने वाले समय में सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस संतुलन को तय करेगा। उम्मीद की जा सकती है कि अदालत निजता की रक्षा करे लेकिन पत्रकारिता की स्वतंत्रता को कमजोर न होने दे। अन्यथा यह स्वतंत्र और निष्पक्ष मीडिया के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है, जो किसी भी जीवंत लोकतंत्र के लिए खतरनाक होगा।-रजनीश कपूर
 

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