Edited By ,Updated: 17 Oct, 2026 04:30 AM

वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने वाले फॉर्म-6 में किया गया बदलाव सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच विवाद का नया अखाड़ा बना हुआ है। विवाद की मुख्य वजह चुनाव आयोग द्वारा ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया में किए गए बदलाव और नए कड़े नियम जोडऩा है। उस पर सुप्रीम कोर्ट का...
वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने वाले फॉर्म-6 में किया गया बदलाव सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच विवाद का नया अखाड़ा बना हुआ है। विवाद की मुख्य वजह चुनाव आयोग द्वारा ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया में किए गए बदलाव और नए कड़े नियम जोडऩा है। उस पर सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि उसने न तो फॉर्म-6 को मंजूरी दी है और न ही उसे रिजैक्ट किया है, नए विवाद का केंद्र है। ऑनलाइन फॉर्म-6 भरते समय नए मतदाताओं से एक अतिरिक्त घोषणापत्र (एनैक्स्चर डी) मांगा जा रहा है कि क्या उनका, उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली एस.आई.आर. सूची में शामिल था? यदि आवेदक घोषणापत्र में पूरा विवरण नहीं देते तो पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन अगले चरण में आगे नहीं बढ़ता।
अब आरोप पर आते हैं। राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं का आरोप है कि इन कठिन शर्तों के जरिए देश के नागरिकों, विशेषकर गरीब और वंचित वर्गों के वोटर बनने से रोकने की कोशिश की जा रही है। विपक्ष ने अपनी बात के समर्थन में यह भी कहा कि खुद चुनाव आयोग के 2 आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में इस प्रक्रिया को गैर-कानूनी और अनधिकृत बताते हुए करीब 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज कराई थी। उनका तर्क था कि मतदाता पंजीकरण नियम-1960 के मुताबिक फॉर्म-6 में कोई बदलाव केवल केंद्र सरकार ही संसद की मंजूरी से कर सकती है। इसमें बदलाव करना चुनाव आयोग का अधिकार क्षेत्र नहीं है। उधर इस बात के प्रमाण नहीं मिलते कि चुनाव आयोग की बैठक में फॉर्म-6 का फैसला एकतरफा हुआ है। सहमति या असहमति संभव है लेकिन किसी चीज को लागू करने के लिए विरोध करना एक अलग मामला है। इसके बाद विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे पर अड़ गया है और लगातार प्रदर्शन कर रहा है। विपक्ष ने इस समय इस्तीफा की रणनीति को अपना हथियार बना रखा है। पहले धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की सफलता के बाद अब वह ज्ञानेश के इस्तीफे पर अड़ा हैै।
लेकिन एक सवाल पर अब तक बहुत कम चर्चा हुई है। देश की संवैधानिक संस्थाओं के लिए अपने-अपने मापदंड हैं और उनके अपने अधिकार क्षेत्र हैं। देश में चुनाव कराने का काम निष्पक्ष और साफ-सुथरे तरीके से हो, यह काम चुनाव आयोग का है। मतदान सूची प्रदूषित नहीं हो, यह भी काम जरूरी है। पिछले 20 सालों की वोटर लिस्ट में नाम, पता, पिता का नाम, उम्र आदि में कहीं न कहीं गलतियां दिखाई जाती रही हैं। अपने अनुभव के आधार पर यह दावा कर सकता हूं कि उसमें ये गलतियां 20 प्रतिशत से भी ज्यादा रही हैं। लेकिन अब तकनीक का दौर आने के बाद इनको प्रदूषण से बचाया जा सकता है। फिर भी इस बात की कोई गारंटी नहीं ले सकता कि 140 करोड़ के देश में और 100 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं की सूची में कोई गड़बड़ी नहीं रहेगी। अगर कर्मचारियों और मतदाताओं की सतर्कता की कमी की वजह से यह चूक होती रही तो मतदाता सूचियों के प्रदूषित होने का खतरा लगातार रहेगा। मतदाता सूची में बहुत से मृत, स्थानांतरित डुप्लिकेट वोटर्स के नाम जुड़े हैं, जिन्हें हटाकर सूची को पारदर्शी बनाना जरूरी है। उधर, निर्वाचन आयोग सफाई दे रहा है कि उसने मूल फॉर्म-6 में कोई कानूनी बदलाव नहीं किया है। केवल एक अतिरिक्त संलग्नक जोड़ा है। उसका कहना है कि ऐसा तकनीकी कारण से किया गया है ताकि 2 बार ओ.टी.पी. की जरूरत न पड़े।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आयोग के कदम पर संज्ञान लेते हुए जवाब और रिकॉर्ड तलब कर लिए हैं। अब यह बताना होगा कि आखिर यह बदलाव किसकी अनुमति से किया गया। इसके बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक संग्राम और तेज हो गया है। लेकिन बड़ा सवाल तो यह है कि चुनाव आयोग की प्रक्रिया अगर संविधान सम्मत है तो उसे कौन रोक सकता है? चुनाव आयोग के अपने अधिकार क्षेत्र हैं और उसमें किसी अन्य संवैधानिक संस्था, चाहे वह सुप्रीम कोर्ट ही क्यों न हो, जब तक संविधान का उल्लंघन नहीं होता, का हस्तक्षेप नहीं हो सकता। न्यायपालिका से उसकी समीक्षा तभी संभव है जब वह संविधान की मूल भावना के विपरीत हो।
विपक्ष के अलावा सिविल सोसायटियों से भी फॉर्म-6 में बदलाव पर बेहद कड़ा और आक्रामक रुख देखने को मिल रहा है। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया और फॉर्म-6 विवाद पर केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और न्यायपालिका पर बेहद कड़े और आक्रामक बयान दिए हैं। उनका यह भी आरोप है कि चुनाव आयोग जबरदस्ती उन करोड़ों लोगों से फॉर्म-6 भरवा रहा है, जिनके नाम एस.आई.आर. प्रक्रिया के तहत डिलीट कर दिए गए हैं या जो एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट हुए हैं।
इस तरह उन्हें यह झूठी घोषणा करने को मजबूर किया जा रहा है कि वे पहली बार वोटर बन रहे हैं। इससे वे कानूनी पचड़े में फंस सकते हैं क्योंकि यह घोषणा अगर झूठी है तो एक साल जेल की सजा का प्रावधान है। यह तय है कि सुप्रीम कोर्ट जो भी आदेश देगा वह माना जाएगा।-हम, देश के लोगअकु श्रीवास्तव