Edited By ,Updated: 01 Jun, 2022 05:22 AM

हाल ही में गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था कि राम मंदिर, सी.ए.ए., ट्रिपल तलाक और अनुच्छेद 370 तो हो गया, अब समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड की बारी है। राष्ट्रीय स्तर पर यूनिफॉर्म सिविल कोड की कई बार चर्चा तो की गई, लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई...
हाल ही में गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था कि राम मंदिर, सी.ए.ए., ट्रिपल तलाक और अनुच्छेद 370 तो हो गया, अब समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड की बारी है। राष्ट्रीय स्तर पर यूनिफॉर्म सिविल कोड की कई बार चर्चा तो की गई, लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठ पाया। अभी देश के केवल एक ही राज्य गोवा में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू है। इसे पुर्तगाली शासन के दौरान ही लागू किया गया था। वर्ष 1961 में गोवा सरकार यूनिफॉर्म सिविल कोड के साथ बनी थी। अब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने यूनिफॉर्म सिविल कोड पर कमेटी बनाने की घोषणा की है। साथ ही यू.पी. में भी इसे लागू करने की तैयारी चल रही है। असल में समान नागरिक संहिता का मुद्दा भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख वायदों में से एक है। इसीलिए अब भाजपा शासित राज्यों में इसे लागू करने की प्रक्रिया शुरू हो रही है।
समान नागरिक संहिता का अर्थ है, देश के हर नागरिक पर एक समान कानून लागू होना, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का हो। अभी देश में अलग-अलग मजहबों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ हैं, लेकिन समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद सभी मजहबों के लोगों को एक जैसे कानून का पालन करना पड़ेगा। हमारे देश में अभी धर्म और परंपरा के नाम पर अलग-अलग नियमों को मानने की छूट है, लेकिन यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने के बाद विवाह, तलाक, बच्चा गोद लेने और संपत्ति के बंटवारे जैसे विषयों में सभी नागरिकों के लिए नियम एक-समान होंगे। वैसे इसके लागू होने से नागरिकों के खान-पान, पूजा-इबादत, वेशभूषा आदि धार्मिक परंपराओं पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
यूनिफॉर्म सिविल कोड का मुस्लिम समाज पुरजोर विरोध करता रहा है। जब 1951 में डा. बी.आर. अंबेडकर और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने हिंदू समाज के लिए हिंदू कोड बिल लाने की कोशिश की थी, तब भी उसके खिलाफ आवाजें उठी थीं। साथ ही केवल एक धर्म विशेष के लिए ऐसा कानून लाने पर सवाल भी उठाए गए थे। यूनिफॉर्र्म सिविल कोड का विरोध करने वालों का तर्क है कि इसके द्वारा सभी धर्मों पर हिंदू कानून लागू कर दिया जाएगा।
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए, इसे अपने अधिकारों का हनन और धार्मिक परंपराओं पर हमला बताया और इसे मानने से इन्कार किया है। उनका मानना है कि सबके लिए समान कानून लागू होने पर मुसलमान एक से अधिक शादियां नहीं कर पाएंगे। बीवी को तलाक देने के लिए कानून का सहारा लेना होगा और वे अपनी शरीयत के हिसाब से जायदाद का बंटवारा भी नहीं कर पाएंगे।
संविधान बनाते वक्त समान नागरिक संहिता पर काफी चर्चा हुई थी, लेकिन उस समय की परिस्थितियों में इसे लागू करना सही नहीं समझा गया। इसलिए इसे अनुच्छेद 44 में नीति निर्देशक तत्वों की श्रेणी में जगह दी गई। नीति निर्देशक तत्व संविधान का वह हिस्सा हैं, जिनके आधार पर सरकार से काम करने की उम्मीद की जाती है। वर्ष 1954-55 में भारी विरोध के बावजूद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ङ्क्षहदू कोड बिल लाए थे। इसके आधार पर ङ्क्षहदू विवाह कानून और उत्तराधिकार कानून बने। यानी हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख समुदायों के लिए शादी, तलाक, उत्तराधिकार जैसे नियम तो संसद में तय कर दिए गए। लेकिन मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदायों को अपने-अपने धार्मिक कानून यानी पर्सनल लॉ के अनुसार चलने की छूट दे दी गई। ये छूट नागा आदि कई आदिवासी समुदायों को भी प्राप्त हुई, जो अपनी परंपरा के हिसाब से कानूनों का पालन करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार कहा है कि भारत अब तक यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने के लिए कोई प्रयास नहीं कर रहा, जिसके बाद सरकार ने पिछले वर्ष लॉ कमीशन को मामले पर रिपोर्ट देने के लिए कहा था। अलग-अलग लोगों से विस्तृत चर्चा और कानूनी व सामाजिक स्थितियों की समीक्षा के आधार पर लॉ कमीशन ने कहा कि अभी समान नागरिक संहिता लागू करना मुमकिन नहीं है। इसकी बजाय मौजूदा पर्सनल लॉ में सुधार किया जाए व मौलिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता में संतुलन बनाया जाए। संसद पारिवारिक मसलों से जुड़े पर्सनल लॉ को लिखित रूप देने पर विचार करे। सभी समुदायों में समानता लाने से पहले एक समुदाय के भीतर स्त्री-पुरुष के अधिकारों में समानता लाने की कोशिश की जानी चाहिए।
यूनिफॉर्म सिविल कोड की मांग करने वाली कई याचिकाएं दिल्ली हाई कोर्ट में लंबित हैं। अलग-अलग धर्मों से जुड़े मामलों के कारण न्यायालयों पर भारी बोझ पड़ता है और मामलों के निपटारे में भी अधिक समय लगता है। लेकिन यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने के बाद अदालतों में लंबित पड़े मामलों के फैसले जल्द होंगे और इस तरह न्यायपालिका के बोझ में कमी आएगी। इसके लागू होने के बाद राष्ट्रीय एकता मजबूत होगी और देश की राजनीति में भी सुधार आने की उम्मीद है। समान संहिता लागू होने पर विवाह, विरासत, उत्तराधिकार समेत विभिन्न मुद्दों से संबंधित जटिल कानून सरल बनेंगे और सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होंगे।
वर्तमान में मौजूद सभी व्यक्तिगत कानूनों में लैंगिक पक्षपात की समस्या है, जिसे समान नागरिक संहिता लागू करके दूर किया जा सकेगा। समान नागरिक संहिता महिलाओं, धार्मिक अल्पसंख्यकों व संवेदनशील वर्गों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करेगी। साथ ही इसकी एकरूपता से देश में राष्ट्रवादी भावना को बल मिलेगा। इसलिए समान नागरिक संहिता देश में लागू होना बहुत जरूरी है, जिसके बाद कई विवाद स्वत: ही समाप्त हो जाएंगे।-रंजना मिश्रा