दिल्ली रेलवे स्टेशन की त्रासदी एक बड़ी लापरवाही

Edited By Updated: 18 Feb, 2025 05:28 AM

the tragedy of delhi railway station is a big negligence

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ से हुई मृत्यु ने संपूर्ण देश को विचलित किया है। भगदड़ एक सामान्य शब्द है जिसके प्रयोग से अनेक दोष व लापरवाहियां आदि छिप जाते हैं। भगदड़ के पीछे के कारण महत्वपूर्ण होते  हैं। साफ हो गया है कि रेलवे स्टेशन पर बढ़ती हुई...

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ से हुई मृत्यु ने संपूर्ण देश को विचलित किया है। भगदड़ एक सामान्य शब्द है जिसके प्रयोग से अनेक दोष व लापरवाहियां आदि छिप जाते हैं। भगदड़ के पीछे के कारण महत्वपूर्ण होते  हैं। साफ हो गया है कि रेलवे स्टेशन पर बढ़ती हुई भीड़ तथा उसे संभालने, व्यवस्थित व नियंत्रित करने की व्यवस्था के बीच कोई तारतम्य नहीं था। 

सच कहा जाए तो पूरी व्यवस्था को उसके हवाले छोड़ दिया गया था। रेलवे की ओर से तर्क दिया जा रहा कि किसी रेल का प्लेटफार्म नहीं बदला और कोई रेल रद्द नहीं हुई और अफवाह फैल गई।  अगर अफवाह फैली तो तत्काल उसे रोकने और लोगों की गलतफहमी दूर करने की जिम्मेवारी किसकी थी? क्या रेलवे के पास कर्मचारियों की इतनी कमी है कि आपात स्थिति में उनसे उन प्लेटफार्मों पर पहुंच कर यात्रियों के साथ सीधा संवाद करने, उन्हें समझाने, नियंत्रित और व्यवस्थित करने की कोशिश नहीं होती? 

क्या रेलवे के कंट्रोल रूम से लगातार लाऊडस्पीकर से  घोषणा नहीं की जा सकती थी कि कोई भी ट्रेन रद्द नहीं हुई है, किसी का प्लेटफार्म बदला नहीं गया है? आप हड़बड़ी में दौड़ें नहीं ट्रेन किसी यात्री को छोड़कर नहीं जाएगी? क्या जो अशक्त थे, कमजोर महिलाएं आदि सामान लिए खड़े थे वे ट्रेनों में कैसे सवार होंगे उनके लिए कुछ विचार रेलवे ने किया था? वास्तव में इस तरह की ट्रैजिक घटनाओं, जिसको होना नहीं चाहिए, के पीछे केवल तात्कालिक नहीं, लंबे समय की दुव्र्यवस्थाएं होती हैं। इसलिए इस घटना का भी समग्रता में विचार करना होगा।

सच यही है कि स्थिति को संभालने के लिए कोई रेल अधिकारी या आर.पी.एफ. के जवान या अन्य कर्मी प्लेटफार्म पर थे ही नहीं। हां, ट्रैजेडी हो जाने के बाद समझ में आया और भीड़ प्रबंधन के लिए आर.पी.एफ., एन.डी.आर.एफ. और दिल्ली पुलिस के जवान तक तैनात कर दिए गए? यही व्यवस्था पहले की जाती तो ऐसी हृदयविदारक घटना नहीं घटती। किंतु यह रेलवे के परंपरागत रोगों का प्रतिफल भी। सभी 18 मृतकों के पोस्टमार्टम में यही बताया गया है कि ट्रॉमैटिक एक्सफेसिया से मृत्यु हुई। यानी छाती व पेट के ऊपरी हिस्सों पर दबाव पडऩे से सांस एवं रक्त संचार रुक गया। ऐसा होने से दम घुट जाता है और मृत्यु हो जाती है। 

मोटी-मोटी जितनी जानकारी है उसके अनुसार रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 14 पर भगदड़ मची थी। लेकिन क्यों? जानकारी के अनुसार प्लेटफार्म नंबर 12, 13, 14 और 15 पर व्यक्ति के खड़े होने की भी जगह नहीं थी। स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रैस एवं भुवनेश्वर राजधानी विलंब से चल रही थीं। इसके यात्री भी थे। दूसरी ओर मगध एक्सप्रैस और शिवगंगा एक्सप्रैस में बिना टिकट व जनरल टिकट वाले यात्रियों ने आरक्षित-अनारक्षित सभी बोगियों पर एक प्रकार से कब्जा कर लिया, दोनों ट्रेनें निकल गईं इसलिए इसके यात्री भी प्लेटफार्म पर रह गए। प्लेटफॉर्म 12 से शिवगंगा एक्सप्रैस तथा 14 से मगध एक्सप्रैस गई थीं।

प्लेटफार्म नंबर 14 और 15 से प्रयागराज एक्सप्रैस और वाराणसी सुपरफास्ट जानी थीं। स्वाभाविक ही इन दोनों प्लेटफार्म पर आने के लिए यात्री प्लेटफार्म 16 की ओर से आ रहे थे। जैसी जानकारी है इसी बीच घोषणा हुई कि प्लेटफार्म 16 से प्रयागराज विशेष ट्रेन रवाना होगी। कुछ का कहना है कि प्रयागराज विशेष और प्रयागराज एक्सप्रैस को लेकर भ्रम होने पर भी लोग 16 की ओर भागने लगे और इसी दौरान सीढिय़ों पर दबाव बढ़ा तथा इतनी बड़ी त्रासदी हो गई। इन घटनाओं को देखें तो साफ हो जाता है कि रेलवे ने किसी स्तर पर उचित प्रबंध नहीं किया। अगर घोषणा में बताया जाता कि यह प्रयागराज एक्सप्रैस नहीं प्रयागराज विशेष है तब भी बहुत समस्या नहीं होती।  ध्यान रखिए, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर यात्रियों की सुरक्षा की दृष्टि से इंटीग्रेटेड सी.सी.टी.वी. मॉनिटरिंग प्रणाली है। डी.आर.एम. कार्यालय से स्क्रीन पर स्टेशन व अन्य व्यवस्थाओं की निगरानी की जाती है। तो यह संभव ही नहीं है कि स्थिति दिखाई नहीं दे रही हो। ध्यान से देखा जाए तो सी.सी.टी.वी. में लोगों की आपसी बातचीत का भी पता चलता है। वैसे भी सप्ताहांत शनिवार और रविवार को रेलवे स्टेशनों पर भारी भीड़ रहती है। 

होली का त्यौहार आने से काफी पहले पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, पूर्वोत्तर, झारखंड आदि के लोग अपने गांवों-शहरों की ओर लौटना चाहते हैं और यह लंबे समय की प्रकृति रही है। इसमें प्रयागराज की ओर जाने का देश भर में वातावरण है और दुर्घटनाओं या अन्य बातों से लोग अप्रभावित होकर जा रहे हैं। इसका ध्यान रखते हुए दिल्ली के कम से कम आनंद विहार, नई दिल्ली और पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशनों पर विशेष व्यवस्था होनी ही चाहिए थी। आम लोगों को केवल उनकी नियति के भरोसे नहीं छोड़ सकते। ऐसा ही रेलवे ने किया। निश्चित रूप से  इस कुव्यवस्था तथा मृत्यु के लिए जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। रेलवे की यात्रा करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को हमेशा कुछ न कुछ दुखद और असुविधाजनक अनुभव होते हैं और हमारे देश में झेलने की आदत पड़ी हुई है।

दुर्भाग्य से इस हादसे के बाद कुंभ को ही निशाना बनाया जाने लगा है मानो दोषी रेलवे नहीं कुंभ हो। कुंभ हमारी सभ्यता, संस्कृति व अध्यात्म का ऐसा विलक्षण आयोजन है जिस पर किसी प्रकार का ग्रहण नहीं लगना चाहिए। केंद्र एवं प्रदेश सरकार को निशाना बनाना भी राजनीतिक लक्ष्य होता है। जिन कारणों से ट्रैजेडी हुई उन पर बात हो। विपक्ष सरकार की आलोचना करें, कार्रवाई की मांग करें इससे असहमति नहीं। किंतु कुंभ को इसके लिए निशाना न बनाया जाए। यही हमारे देश, समाज और सबके हित में होगा।-अवधेश कुमार
 

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