Edited By ,Updated: 04 Jan, 2026 05:25 AM

साल 2025 की आपकी सबसे स्मरणीय याद क्या है? वह कौन सा शब्द है जो उस याद को बयां करेगा? वह कौन सा शब्द है जिसने भारत में ज्यादातर लोगों को प्रभावित किया?
साल 2025 की आपकी सबसे स्मरणीय याद क्या है? वह कौन सा शब्द है जो उस याद को बयां करेगा? वह कौन सा शब्द है जिसने भारत में ज्यादातर लोगों को प्रभावित किया?
कम समय तक चलने वाले शब्द : एक संभावित उम्मीदवार सिंदूर है। नैशनल इन्वैस्टिगेशन एजैंसी के अनुसार, पहलगाम में आतंकी हमला 3 पाकिस्तानी घुसपैठियों और उनके 2 भारतीय सहयोगियों ने किया था, जिन्होंने उन्हें पनाह दी थी। इसका जवाब, ऑप्रेशन सिंदूर, एक सोच-समझकर किया गया युद्ध था। भारतीय वायु सेना, मिसाइलों और ड्रोन ने पाकिस्तान के सैन्य बुनियादी ढांचे को काफी नुकसान पहुंचाया और बदले में भारत को भी कुछ नुकसान हुआ (जो युद्ध में अपरिहार्य है)। तीनों पाकिस्तानी एक मुठभेड़ में मारे गए। जांच के दौरान गिरफ्तार किए गए 2 भारतीयों के बारे में अभी तक कुछ पता नहीं चला। नतीजों के बारे में पारदॢशता की कमी अभी भी युद्ध पर बनी हुई है। ऑप्रेशन सिंदूर सिर्फ 4 दिन चला और यह इतना छोटा था कि कोई स्थायी छाप नहीं छोड़ सका।
एक और उम्मीदवार टैरिफ है। 2 अप्रैल, 2025 से, यह शब्द हर बातचीत में शामिल होने लगा। इसका सिर्फ एक ही प्रतिद्वंद्वी शब्द था-ट्रम्प! ट्रम्प और टैरिफ ने कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं को बर्बाद कर दिया, और इसका अभी तक कोई अंत नहीं है। उदाहरण के लिए, अमरीकी निर्यात पर पारस्परिक टैरिफ और (रूसी तेल खरीदने के लिए) जुर्माना अभी भी बना हुआ है, जिससे स्टील, एल्युमीनियम और तांबा, कपड़ा, रत्न और आभूषण, समुद्री उत्पाद और रसायनों के निर्यात पर गंभीर असर पड़ रहा है। श्री पीयूष गोयल का ‘निकट भविष्य’ में वादा किया गया द्विपक्षीय व्यापार समझौता 2025 के अंत में भी उतना ही दूर है जितना अप्रैल, 2025 में था।
जी.एस.टी. एक मजबूत दावेदार है। जी.एस.टी. की विनाशकारी शुरुआत के 8 साल बाद, केंद्र सरकार ने अच्छी सलाह पर ध्यान दिया और दर संरचना को तर्कसंगत बनाया तथा वस्तुओं और सेवाओं की एक विस्तृत शृंखला पर टैक्स दरों को कम किया-फिर भी प्रशासनिक उत्पीडऩ बना हुआ है। व्यापारियों के हर समूह ने जी.एस.टी. कानूनों के पालन के बुरे सपने की ओर इशारा किया है। क्योंकि खुदरा खपत के आकार की तुलना में टैक्स में राहत बहुत कम थी, इसलिए खपत में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई। उच्च खपत आबादी के शीर्ष 10वें हिस्से तक ही सीमित थी।
जो शब्द हार गए : एक अपरिचित वाक्यांश-अर्थव्यवस्था के लिए गोल्डीलॉक्स वर्ष-बातचीत में आया लेकिन जल्दी ही गायब हो गया। साहित्यिक संकेत शिक्षित लोगों के लिए भी अपरिचित था। इसके अलावा, आई.एम.एफ. ने भारत के राष्ट्रीय खातों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया। पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार से लेकर प्रोफैसरों और रिसर्चर्स तक, कई लोगों ने अर्थव्यवस्था की कमजोरियों पर बात की। आखिरकार, नौकरियों की मांग के शोर ने आधिकारिक तौर पर मनाए जा रहे जश्न को दबा दिया। यहां एक सोचने वाली बात है- मौजूदा विकास दर पर, अमरीका, चीन और भारत ने 2025 में अपनी जी.डी.पी. में निम्नलिखित ‘आऊटपुट’ जोड़ा (लगातार अमरीकी डालर में) :
देश विकास दर 2025 में जोड़ा
गया आऊटपुट
चीन 4.8 प्रतिशत 931 बिलियन डालर
अमरीका 1.8 551 बिलियन डालर
भारत 6.6 276 बिलियन डालर
जबकि चीन अमरीका (सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था) के साथ अंतर कम कर रहा है, भारत और चीन के बीच और भारत और अमरीका के बीच अंतर बढ़ रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था में कई कमजोरियां हैं, जिन्हें सरकार मानने से इंकार करती है या, शायद, समझती भी नहीं है। द हिंदू ने इस तरह संपादकीय लिखा- ‘अमरीका द्वारा लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ अभी भी लागू हैं, निजी निवेश सुस्त बना हुआ है, विदेशी पूंजी देश से बाहर जा रही है, कमजोर रुपया आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्था के लिए आयात को और महंगा बना रहा है, वास्तविक वेतन तेजी से नहीं बढ़ रहे और उपभोक्ता मांग कमजोर बनी हुई है’। गोल्डीलॉक्स का दावा खोखला है।
एक समय आम तौर पर इस्तेमाल होने वाला शब्द सैक्युलर अब लगभग गायब हो गया है। यह साल का ऐसा शब्द बन गया, जिसका इस्तेमाल नहीं होता। बहुत कम लोग खुद को गर्व से सैक्युलर बताते हैं। संपादकीय लेखक इस शब्द से बचते हैं। मूल रूप से, सैक्युलर का मतलब राज्य और धर्म का अलगाव था, लेकिन बाद में, इसका मतलब यह हो गया कि एक सैक्युलर व्यक्ति के मूल्य तर्क और मानवतावाद पर आधारित होते हैं, न कि धार्मिक सिद्धांतों पर।
शर्मनाक ‘विजेता’ : धर्मनिरपेक्षता के पीछे हटने से नफरत (हेट) को बढ़ावा मिला है, एक ऐसा शब्द, जिसकी हर धर्म निंदा करता है। दुख की बात है कि नफरत भरी बातों और लेखों के ज्यादातर उदाहरण धर्म पर आधारित हैं। नफरत के दूसरे कारण नस्ल, भाषा और जाति हैं। सबसे साफ दिखने वाली नफरत मुसलमानों, मुसलमानों के पहनावे और खाने के तरीकों और मुसलमानों के पूजा स्थलों के खिलाफ है। मुसलमानों की नमाज में रुकावट डाली जाती है या उन्हें रोका जाता है। झूठा बहाना यह दिया जाता है कि मुसलमानों ने भारत पर हमला किया था और 6 सदियों तक भारत के कई हिस्सों पर राज किया था तथा अब हिंदुओं का समय है कि वे मुसलमानों को उनकी जगह दिखाएं।
गुस्से का दूसरा शिकार ईसाई समुदाय है। ईसाई चर्चों में तोडफ़ोड़ की जाती है, ईसाई पादरियों और प्रचारकों को मारा जाता है तथा कैरल गाने वाले ईसाई बच्चों पर हमला किया जाता है। यह सब हिंदू ‘अधिकारों’ को जताने के नाम पर किया जाता है। ङ्क्षहदू वर्चस्व के विचार से ज्यादा भारत के संविधान के लिए घिनौना कुछ नहीं हो सकता। भारत का विचार नागरिकता की नींव पर बना है, न कि धर्म या नस्ल अथवा जाति या भाषा पर। भारत के ज्यादातर लोग डा. अब्दुल कलाम और मदर टेरेसा का सम्मान करते हैं, लेकिन कुछ लोग मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ नफरत फैलाते हैं।
सबसे चिंताजनक बात ऐसे गैर-कानूनी कामों को सही ठहराने या उन्हें जायज ठहराने की कोशिश है। मुख्य दोषी राज्य, अहम पदों पर बैठे नेता और कुछ संगठन हैं, जिन्हें राज्य के संरक्षण के कारण बढ़ावा मिला है। उनके शब्द, काम या चुप्पी नफरत फैलाने वालों को अत्याचार करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। यह चलन भारत को तोड़ देगा और जो होना है वह होकर रहेगा- एक ऐसा भारत जो संकीर्ण घरेलू दीवारों से टुकड़ों में बंट जाएगा। इन सभी कारणों से, गहरे शर्म और अफसोस के साथ, मैं उस शब्द को चुनता हूं, जिसने 2025 में भारत को परिभाषित किया-हेट यानी नफरत।-पी. चिदम्बरम