Edited By ,Updated: 05 Feb, 2026 05:29 AM

26 जनवरी को, जब देश राष्ट्रीय राजधानी में सांस्कृतिक विविधता और देश की सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करके गणतंत्र दिवस मना रहा था, उत्तराखंड के एक छोटे से शहर कोटद्वार में एक शर्मनाक घटना हो रही थी, जो बढ़ती सांप्रदायिकता और समाज में बढ़ते जहर को दिखा रही...
26 जनवरी को, जब देश राष्ट्रीय राजधानी में सांस्कृतिक विविधता और देश की सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करके गणतंत्र दिवस मना रहा था, उत्तराखंड के एक छोटे से शहर कोटद्वार में एक शर्मनाक घटना हो रही थी, जो बढ़ती सांप्रदायिकता और समाज में बढ़ते जहर को दिखा रही थी। अगर आप टैलीविजन न्यूज देखते हैं, तो इस बात की बहुत कम संभावना है कि आपको पता चले कि उस दिन कोटद्वार में क्या हुआ था। अगर आप अखबार पढ़ते हैं, तो हो सकता है कि आपने अखबार के अंदर के पन्ने पर घटना के बारे में एक रिपोर्ट पढ़ी हो, लेकिन अगर आप सोशल मीडिया फॉलो करते हैं, तो आपको निश्चित रूप से इस घटना के बारे में पता होगा, जिस पर करोड़ों प्रतिक्रियाएं आई हैं।
उस दिन, बजरंग दल के होने का दावा करने वाले कुछ युवकों का एक समूह कपड़ों की दुकान पर आया और उसके मालिक, एक सत्तर साल के मुस्लिम, से दुकान का नाम बदलने की मांग की। दुकान का नाम बाबा स्कूल ड्रैस एंड मैचिंग सैंटर था। उन्हें दुकान के नाम में अंग्रेजी शब्दों से कोई दिक्कत नहीं थी। उनकी आपत्ति नाम में ‘बाबा’ शब्द के इस्तेमाल पर थी। उन्होंने दावा किया कि ‘बाबा’ शब्द भगवान शंकर से जुड़ा है और एक मुस्लिम दुकानदार इस नाम का इस्तेमाल नहीं कर सकता, जबकि उसी साइनबोर्ड पर मुस्लिम मालिक का नाम भी लिखा था। उन्होंने दुकानदार की इस बात से सहमति नहीं जताई कि ‘बाबा’ शब्द फकीरों और पीरों से भी जुड़ा होता है। उसी समय एक युवक आगे आया और उसने बजरंग दल के कार्यकत्र्ताओं से सवाल किया। उन्होंने उसका नाम पूछा और उसने तुरंत बताया कि उसका नाम ‘मोहम्मद’ दीपक है, जाहिर है, मुस्लिम भाइयों के साथ अपनी एकजुटता दिखाने के लिए। वह एक जिम का मालिक और बॉडी बिल्डर था, जिसके पास के जिम में अपने ग्राहकों को आशीर्वाद देने और प्रेरित करने के लिए बजरंग बली का एक बड़ा पोस्टर लगा था।
वह उन युवकों के समूह और दुकानदार के बीच एक दीवार बनकर खड़ा हो गया और उन्हें जाने के लिए कहा। समूह के पास पीछे हटने के अलावा कोई चारा नहीं था। हालांकि, बजरंग दल के कार्यकत्र्ताओं ने देहरादून से मदद मांगी, जहां से 100 से 150 समर्थकों का एक गिरोह कोटद्वार में घुस आया और मुस्लिम दुकानदार के खिलाफ नारे लगाए और दीपक को धमकी दी। उन्होंने उसे मुसलमानों से जुड़े हर तरह के अपमानजनक नामों से पुकारा और उसे रोकने की हिम्मत दिखाई। तब तक काफी संख्या में पुलिसकर्मी भी मौके पर पहुंच चुके थे और वे गंभीर उकसावे के बावजूद प्रदर्शनकारियों को वापस भेजने में कामयाब रहे।
विडंबना यह है कि जब लाखों लोग दीपक द्वारा दिखाए गए साहस का जश्न मना रहे थे और बजरंग दल के कार्यकत्र्ताओं की कार्रवाई की निंदा कर रहे थे, तो पुलिस ने दीपक के खिलाफ ही एफ.आई.आर. दर्ज कर दी! आरोप यह था कि वह सार्वजनिक व्यवस्था को खतरे में डाल और उपद्रव कर रहा था! निष्पक्ष रूप से कहें तो स्थानीय पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के एक समूह के खिलाफ भी एफ.आई.आर. दर्ज की लेकिन वह ‘अज्ञात व्यक्तियों’ के खिलाफ दर्ज की गई। यह इस तथ्य के बावजूद कि समूह के कम से कम 5 नेताओं की पहचान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उनकी तस्वीरों के साथ की गई थी। यह वही उत्तराखंड पुलिस है, जो उस वी.आई.पी. को बचाने की पूरी कोशिश कर रही थी जिसने अंकिता, एक होटल रिसैप्शनिस्ट, से यौन संबंध बनाने की मांग की थी, जिसकी ऋषिकेश में बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। और यह वही राज्य है जहां हाल ही में त्रिपुरा के एक लड़के को सिर्फ इसलिए युवकों के एक समूह ने पीट-पीटकर मार डाला क्योंकि उसका चेहरा ‘चीनियों जैसा’ था।
वैसे, उत्तराखंड देश का पहला राज्य है जिसने समान नागरिक संहिता (यू.सी.सी.) लागू की है और इसके मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपने पूर्वाग्रहों को छिपाने की कोई कोशिश नहीं करते। वास्तव में, गुजरात के बाद, उत्तराखंड राज्य हिंदुत्व की प्रयोगशाला बन गया है। दुर्भाग्य से, सांप्रदायिकता और जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव का यह वायरस कम होने के कोई संकेत नहीं दिखा रहा। यह वास्तव में और खराब होता जा रहा है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा का मामला लें। राज्य में अल्पसंख्यकों के खिलाफ उनकी बयानबाजी जगजाहिर है और हो सकता है कि बंगलादेश से मुसलमानों के बढ़ते आप्रवासन पर उनकी चिंता जायज हो। लेकिन राज्य के लोगों को मुस्लिम मजदूरों का बहिष्कार करने की उनकी ताजा सलाह बहुत ही चौंकाने वाली है। उन्होंने लोगों से कहा कि अगर कोई (मुस्लिम) रिक्शावाला सवारी के लिए 5 रुपए मांगे, तो उसे सिर्फ 4 रुपए दें! और सच में, सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो सामने आए हैं, जिनमें कॉलेज के छात्र ऐसा ही कर रहे हैं-बेचारे रिक्शावाले को एक रुपया देने से मना कर रहे हैं! हम बस यही उम्मीद कर सकते हैं कि हमारे राजनीतिक नेताओं को सद्बुद्धि आए।-विपिन पब्बी