महिलाओं के नाम पर यह खानापूर्ति क्यों

Edited By Updated: 25 Sep, 2023 05:06 AM

why this food supply in the name of women

33 फीसदी ही क्यों, पचास फीसदी आरक्षण महिलाओं के लिए होना चाहिए। इस 50 फीसदी में से दलित और वंचित समाज की महिलाओं का कोटा भी आरक्षित होना चाहिए। आजादी के 75 वर्ष बाद देश की आधी आबादी को विधायिका में एक तिहाई आरक्षण का कानून पास करके पक्ष और विपक्ष...

33 फीसदी ही क्यों, पचास फीसदी आरक्षण महिलाओं के लिए होना चाहिए। इस 50 फीसदी में से दलित और वंचित समाज की महिलाओं का कोटा भी आरक्षित होना चाहिए। आजादी के 75 वर्ष बाद देश की आधी आबादी को विधायिका में एक तिहाई आरक्षण का कानून पास करके पक्ष और विपक्ष भले ही अपनी पीठ थपथपा लें पर ये कोई बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं है। जब महिलाएं देश की आधी आबादी हैं तो उन्हें उनके अनुपात से भी कम आरक्षण देने का औचित्य क्या है? 

क्या महिलाएं परिवार, समाज और देश के हित में सोचने, समझने, निर्णय लेने और कार्य करने में पुरुषों से कम सक्षम हैं? देखा जाए तो वे पुरुषों से ज्यादा सक्षम हैं और हर कार्य क्षेत्र में नित्य अपनी सफलता के झंडे गाढ़ रही हैं। यहां तक कि भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमान की पायलट तक महिलाएं बन चुकी हैं। 

दुनिया की अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सी.ई.ओ. तक भारतीय महिलाएं हैं। अनेक देशों में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पदों पर महिलाएं चुनी जा चुकी हैं और सफलतापूर्वक कार्य करती रही हैं। अगर जमीनी स्तर पर देखा जाए तो उस मजदूर महिला का ध्यान कीजिए जो 9 महीने तक गर्भ में बालक को रखे हुए भवन निर्माण के काम में कठिन मजदूरी करती है और उसके बाद सुबह-शाम अपने परिवार के भरण-पोषण का जिम्मा भी उठाती है। अक्सर इतना ही काम करने वाले पुरुष मजदूर मजदूरी करने के बाद या तो पलंग तोड़ते हैं या दारू पीकर घर में तांडव करते हैं। 

हमारे देश की राष्ट्रपति, जिस जनजातीय समाज से आती हैं वहां की महिलाएं घर और खेती के दूसरे सब काम करने के अलावा ईंधन के लिए लकड़ी बीन कर भी लाती हैं। जब हर कार्य क्षेत्र में महिलाएं पुरुषों से आगे हैं तो उन्हें आबादी में उनके अनुपात के मुताबिक प्रतिनिधित्व देने में हमारे पुरुष प्रधान समाज को इतना संकोच क्यों है? जो अधिकार उन्हें दिए जाने की घोषणा संसद के विशेष अधिवेशन में की गई वह भी अभी 5-6 वर्षों तक लागू नहीं होगी। तो उन्हें मिला ही क्या कोरे आश्वासन के सिवाय। 

इस संदर्भ में कुछ अन्य खास बातों पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है। आज के दौर में ग्राम प्रधान व नगर पालिकाओं के अध्यक्ष पद के लिए व महानगरों के मेयर पद के लिए जो सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं उनका क्या हश्र हो रहा है, यह भी देखने व समझने की बात है। देश के हिन्दी भाषी प्रांतों में एक नया नाम प्रचलित हुआ है, ‘प्रधान पति’। मतलब यह कि महिलाओं के लिए आरक्षित इन सीटों पर चुनाव जितवाने के बाद उनके पति ही उनके दायित्वों का निर्वाह करते हैं। ऐसी सब महिलाएं प्राय: अपने पति की ‘रबड़ स्टाम्प’ बन कर रह जाती हैं। अत: आवश्यक है कि हर शहर के एक स्कूल और एक कॉलेज में नेतृत्व प्रशिक्षण का कोर्स चलाया जाए। जिनमें दाखिला लेने वाली महिलाओं को इन भूमिकाओं के लिए प्रशिक्षित किया जाए, जिससे भविष्य में उन्हें अपने पतियों पर निर्भर न रहना पड़े। 

इसके साथ ही मुख्यमंत्री कार्यालयों से ये निर्देश भी जारी हों कि ऐसी सभी चुनी गई महिलाओं के पति या परिवार का कोई अन्य पुरुष सदस्य अगर उनका प्रतिनिधित्व करते हुए पाए जाएंगे तो इसे दंडनीय अपराध माना जाएगा। उस क्षेत्र का कोई भी जागरूक नागरिक उसकी इस हरकत की शिकायत कर सकेगा। आज तक होता यह है कि जिला स्तर की बैठक हो या प्रदेश स्तर की या चुनी हुई इन प्रतिनिधियों के प्रशिक्षण का शिविर हो, हर जगह पत्नी के बॉडीगार्ड बन कर पति मौजूद रहते हैं। यहां तक कि चुनाव के दौरान और जीतने के बाद भी इन महिला प्रतिनिधियों के होर्डिंगों पर इनके चित्र के साथ इनके पति का चित्र भी प्रमुखता से प्रचारित किया जाता है। इस पर भी चुनाव आयोग को प्रतिबंध लगाना चाहिए। कोई भी होर्डिंग ऐसा न लगे जिसमें ‘प्रधान पति’ का नाम या चित्र हो। 

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे समाज में चली आ रही इन रूढि़वादी बातों पर हमेशा से जोर दिया गया है कि घर की महिला जब भी घर की चौखट से पांव बाहर रखेगी तो उसके साथ घर का कोई न कोई पुरुष अवश्य होगा। इन्हीं रूढि़वादी सोचों के चलते महिलाओं को घर की चार दीवारी में ही सिमट कर रहना पड़ा। परंतु जैसे सोच बदलने लगी तो महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिए जाने में किसी को कोई गुरेज नहीं। आज महिलाएं पुरुषों के साथ हर क्षेत्र में कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं। इसलिए महिलाओं को पुरुषों से कम नहीं समझना चाहिए। इस विधेयक को लाकर सरकार ने अच्छी पहल की है किंतु इसके बावजूद महिलाओं को आरक्षण का लाभ मिलने में वर्षों की देरी के कारण ही विपक्ष आज सरकार को घेर रहा है। 

वैसे हम इस भ्रम में भी न रहें कि सभी महिलाएं पाक-साफ या दूध की धुली होती हैं और बुराई केवल पुरुषों में होती है। पिछले कुछ वर्षों में देश के अलग-अलग प्रांतों में निचले अधिकारियों से लेकर आई.ए.एस.  और आई.पी.एस. स्तर तक की भी महिला अधिकारी बड़े-बड़े घोटालों में लिप्त पाई गई हैं। इसलिए यह मान लेना कि महिला आरक्षण देने के बाद सब कुछ रातों-रात सुधर जाएगा, हमारी नासमझी होगी। जैसी बुराई पुरुष समाज में है वैसी बुराइयां महिला समाज में भी हैं क्योंकि समाज का कोई एक अंग दूसरे अंग से अछूता नहीं रह सकता। पर कुछ अपवादों के आधार पर यह फैसला करना कि महिलाएं अपने प्रशासनिक दायित्वों को निभाने में सक्षम नहीं हैं इसलिए फिलहाल उन्हें एक-तिहाई सीटों पर ही आरक्षण दिया जा रहा है ठीक नहीं है। यह सूचना कि भविष्य में उन्हें इनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण दे दिया जाएगा सपने दिखाने जैसा है। अगर हमारी सोच नहीं बदली और मौजूदा ढर्रे पर ही महिलाओं के नाम पर यह खानापूर्ति होती रही तो कभी कुछ नहीं बदलेगा।-विनीत नारायण 
 

Trending Topics

IPL
Royal Challengers Bengaluru

190/9

20.0

Punjab Kings

184/7

20.0

Royal Challengers Bengaluru win by 6 runs

RR 9.50
img title
img title

Be on the top of everything happening around the world.

Try Premium Service.

Subscribe Now!