EU के नए तेल प्रतिबंध से भारत की कंपनियों को झटका, रिलायंस और नायरा पर असर

Edited By Updated: 19 Jul, 2025 12:10 PM

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यूरोपीय संघ (EU) ने रूस से आने वाले क्रूड ऑयल और उससे बने ईंधन पर अपने 18वें प्रतिबंध पैकेज के तहत सख्त कार्रवाई की है। इस फैसले से भारत की दो बड़ी कंपनियों—रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड और नायरा एनर्जी—को बड़ा झटका लग सकता है, जो यूरोप में ईंधन का...

बिजनेस डेस्कः यूरोपीय संघ (EU) ने रूस से आने वाले क्रूड ऑयल और उससे बने ईंधन पर अपने 18वें प्रतिबंध पैकेज के तहत सख्त कार्रवाई की है। इस फैसले से भारत की दो बड़ी कंपनियों—रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड और नायरा एनर्जी—को बड़ा झटका लग सकता है, जो यूरोप में ईंधन का प्रमुख निर्यात करती हैं।

3 सितंबर से लागू होगा नया प्राइस कैप

EU ने रूसी कच्चे तेल की कीमत सीमा को 60 डॉलर प्रति बैरल से घटाकर 47.6 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है। यह नई कीमत सीमा 3 सितंबर 2025 से प्रभावी होगी। साथ ही रूस से जुड़े तेल परिवहन जहाजों और नायरा एनर्जी जैसी कंपनियों पर भी सीधा प्रतिबंध लगाया गया है।

नायरा एनर्जी पर सीधा असर

नायरा एनर्जी में रूसी कंपनी Rosneft की 49% हिस्सेदारी है। EU के नए प्रतिबंधों के तहत अब यह कंपनी यूरोपीय बाजार में अपने उत्पाद निर्यात नहीं कर सकेगी। इसके अलावा, कंपनी को यूरोपीय बैंकिंग सेवाओं और तकनीकी सहायता तक पहुंच भी मुश्किल हो सकती है।

रिलायंस के लिए भी दोहरी चुनौती

रिलायंस इंडस्ट्रीज रूस से सस्ते दाम पर कच्चा तेल खरीदती है, जिससे उसे रिफाइनिंग में फायदा मिलता है। लेकिन अब, यदि वह रूसी तेल खरीदना जारी रखती है, तो यूरोप का लाभदायक डीजल बाजार उसके लिए बंद हो सकता है। वहीं रूसी तेल छोड़ने पर उसे महंगा कच्चा तेल खरीदना पड़ेगा, जिससे रिफाइनिंग मार्जिन पर सीधा असर पड़ सकता है।

भारत ने जताया विरोध

भारत सरकार ने EU के इस एकतरफा कदम का विरोध किया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत ऐसे किसी एकतरफा प्रतिबंध को मान्यता नहीं देता। उन्होंने कहा कि देश की ऊर्जा सुरक्षा सर्वोपरि है और इसमें दोहरे मापदंड नहीं होने चाहिए।

प्रतिबंध लागू करना EU के लिए भी आसान नहीं

विशेषज्ञों के अनुसार, इन प्रतिबंधों को लागू करना EU के लिए भी आसान नहीं होगा, क्योंकि अधिकांश तेल व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता है और इस पर अमेरिका का नियंत्रण ज्यादा है। खास बात यह भी है कि भारतीय कंपनियां सीधे यूरोपीय ग्राहकों से नहीं, बल्कि बिचौलियों के ज़रिए व्यापार करती हैं, जिससे नए प्रतिबंधों को अमल में लाना और जटिल हो सकता है।

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