FPI ने सितंबर में शेयर बाजार से निकाले 35,860 करोड़ रुपए

Edited By Updated: 02 Oct, 2026 05:33 PM

fpis withdrew 35 860 crore from the stock market in september

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) लगातार दो महीने की खरीदारी के बाद सितंबर में शुद्ध रूप से बिकवाल रहे। उन्होंने शेयर बाजार से 35,860 करोड़ रुपए निकाले। सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज लिमिटेड (सीडीएसएल) के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी निवेशकों

नई दिल्लीः विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) लगातार दो महीने की खरीदारी के बाद सितंबर में शुद्ध रूप से बिकवाल रहे। उन्होंने शेयर बाजार से 35,860 करोड़ रुपए निकाले। सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज लिमिटेड (सीडीएसएल) के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी निवेशकों की बिकवाली अक्टूबर में भी जारी रही और उन्होंने एक अक्टूबर को भारतीय शेयर बाजार से 9,232 करोड़ रुपए और निकाले। इससे पहले एफपीआई ने जुलाई में भारतीय शेयरों में 20,200 करोड़ रुपए और अगस्त में 29,630 करोड़ रुपए का निवेश किया था। 

ताजा बिकवाली के साथ एफपीआई 2026 में अब तक भारतीय शेयरों से करीब 2.7 लाख करोड़ रुपए निकाल चुके हैं। यह पूरे 2025 में हुई 1.66 लाख करोड़ रुपए की निकासी से काफी अधिक है। अल्फा एएमसी के कोष प्रबंधक एवं मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) राजेश सिंगला ने कहा कि एफपीआई मुख्य रूप से बाहरी कारकों की वजह से भारतीय शेयरों से पैसा निकाल रहे हैं। इनमें होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी आपूर्ति संबंधी चिंताओं के बीच कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, रुपए की विनिमय दर में गिरावट, अमेरिकी बॉण्ड पर ऊंची प्रतिफल दर, जुलाई-अगस्त में निवेश के बाद मुनाफावसूली और एआई आधारित उत्तर एशियाई बाजारों की ओर पूंजी का रुख शामिल है। 

उन्होंने कहा, "यह वैश्विक स्तर पर पूंजी के आवंटन का मामला है, घरेलू कंपनियों की कमाई का नहीं।" सिंगला ने कहा कि घरेलू एसआईपी के जरिये लगातार आ रहा निवेश विदेशी बिकवाली के असर को कम करने में मदद कर रहा है। उन्होंने कहा कि लघु एवं मझोले उद्यम (एसएमई) और छोटे शेयरों वाले खंड में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम होने से ये खंड विदेशी बिकवाली से तुलनात्मक रूप से कम प्रभावित हुए हैं। 

विश्लेषकों के अनुसार, आगे एफपीआई निवेश पर ईरान-अमेरिका संघर्ष और उसका कच्चे तेल की कीमतों पर असर महत्वपूर्ण रहेगा। उन्होंने कहा कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और अमेरिकी बॉण्ड पर अधिक प्रतिफल से भारतीय शेयरों और एफपीआई निवेश पर दबाव पड़ सकता है। अमेरिका की 10 साल की बॉन्ड प्रतिफल करीब पांच प्रतिशत है। हालांकि, विश्लेषकों ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था का मजबूत प्रदर्शन और कंपनियों की कमाई में मजबूत वृद्धि की उम्मीद सकारात्मक कारक हैं। 

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