25 साल में शेयर बाजार का सबसे बुरा हाल, लगातार 8वें हफ्ते टूटा मार्केट, निवेशकों के डूबे ₹26 लाख करोड़

Edited By Updated: 02 Oct, 2026 11:41 AM

stock market suffers worst performance in 25 years

भारतीय शेयर बाजार में गिरावट का सिलसिला लगातार आठवें सप्ताह भी जारी रहा। इस दौरान घरेलू इक्विटी बेंचमार्क में करीब 9% की कमजोरी दर्ज की गई। इस गिरावट के चलते 8 हफ्ते में निवेशकों के करीब ₹26 लाख करोड़ डूब गए। बाजार की मौजूदा

मुंबईः भारतीय शेयर बाजार में गिरावट का सिलसिला लगातार आठवें सप्ताह भी जारी रहा। इस दौरान घरेलू इक्विटी बेंचमार्क में करीब 9% की कमजोरी दर्ज की गई। इस गिरावट के चलते 8 हफ्ते में निवेशकों के करीब ₹26 लाख करोड़ डूब गए। बाजार की मौजूदा गिरावट पिछले 25 वर्षों में सबसे लंबी साप्ताहिक गिरावट है। 2001 के बाद पहली बार इतनी लंबी गिरावट देखने को मिली है। इससे पहले कोविड-19 लॉकडाउन के शुरुआती दौर में बाजार लगातार सात सप्ताह तक गिरा था।

कारोबार को दौरान बीएसई सेंसेक्स 1,200 अंक तक गिर गया था जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की निफ्टी भी 22,300 अंक के नीचे आ गया था। अंत में सेंसेक्स 570.59 अंक या 0.79% गिरकर 71,909.70 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 50 में 199 अंक या 0.9% की गिरावट आई और यह 22,422 पर बंद हुआ।

बाजार में गिरावट कितनी बड़ी?

आठ हफ्तों की लगातार गिरावट में निफ्टी करीब 8.7 प्रतिशत और सेंसेक्स करीब 8.4 प्रतिशत नीचे आ चुका है। अंकों के लिहाज से देखें तो सेंसेक्स पिछले आठ हफ्तों में 6,590 अंक टूटा। जबकि, निफ्टी में 2,149 अंक की गिरावट आई। इस दौरान बीएसई पर लिस्टेड कंपनियों का कुल मार्केट कैप 26 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा घटा और 467 लाख करोड़ रुपए के नीचे आ गया।

शेयर बाजार क्यों गिर रहा है?

1. FII की लगातार बिकवाली

विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की भारतीय शेयर बाजार में बिकवाली लगातार जारी है। 30 सितंबर को विदेशी निवेशकों ने करीब 10,148 करोड़ रुपए के भारतीय शेयर बेचे। सितंबर महीने में उनकी कुल निकासी करीब 44,013 करोड़ रुपए रही। बड़े पैमाने पर विदेशी पूंजी निकलने से शेयर बाजार पर सीधा दबाव बनता है।

2. कच्चे तेल की कीमतों में तेजी

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भी भारतीय अर्थव्यवस्था और बाजार के लिए चिंता का कारण बनी हुई हैं। ब्रेंट क्रूड करीब 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में महंगा कच्चा तेल देश के आयात बिल और महंगाई को बढ़ा सकता है, साथ ही रुपये पर भी दबाव डाल सकता है।

3. अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में उछाल

अमेरिकी 10 साल की बॉन्ड यील्ड भी करीब 5.3 फीसदी तक पहुंच गई है, जो 2002 के बाद के ऊंचे स्तरों में है। जब अमेरिका जैसे बाजार में बॉन्ड से ज्यादा रिटर्न मिलने लगता है तो विदेशी निवेशकों के लिए उभरते बाजारों में पैसा लगाना कम हो सकता है।

4. रुपए की कमजोरी

विदेशी पूंजी की निकासी और महंगे कच्चे तेल के बीच भारतीय रुपये पर भी दबाव बना हुआ है। 1 अक्टूबर को रुपया करीब 96.32 रुपए प्रति डॉलर तक कमजोर हुआ, जो लगभग दो महीने का निचला स्तर था। रुपए में कमजोरी से कच्चे तेल समेत अन्य आयातित वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है।


  

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