Edited By Ajay Chandigarh,Updated: 14 Sep, 2023 06:51 PM

जूनियर महिला कोच से छेड़छाड़ के मामले में हरियाणा के मंत्री संदीप सिंह की अग्रिम जमानत पर एडीशनल सेशन जज राजीव के बेरी की अदालत में सुनवाई हुई। बचाव पक्ष के वकील ने दलील दी कि संदीप सिंह जांच में शामिल हुए हैं और पुलिस के बुलाने पर समय पर पहुंचते...
चंडीगढ़,(सुशील राज) । जूनियर महिला कोच से छेड़छाड़ के मामले में हरियाणा के मंत्री संदीप सिंह की अग्रिम जमानत पर एडीशनल सेशन जज राजीव के बेरी की अदालत में सुनवाई हुई। बचाव पक्ष के वकील ने दलील दी कि संदीप सिंह जांच में शामिल हुए हैं और पुलिस के बुलाने पर समय पर पहुंचते थे। इसके अलावा 16 सितंबर को मामले की सुनवाई है। संदीप सिंह हर सुनवाई पर पेश होंगे। आरोपी संदीप सिंह की अग्रिम जमानत के लिए वकीलों ने दबाव डाला। वहीं, जूनियर महिला कोच के वकील समीर सेठी और दीपांशु बंसल ने बहस के दौरान योग्यता के आधार पर जमानत के जवाब के साथ गुण-दोष के आधार पर विरोध किया। एस.आई.टी. ने कहा कि संदीप सिंह की जमानत का कोई आधार नहीं बनता है, इसलिए याचिका को खारिज कर देना चाहिए। इसे लेकर कोच पक्ष के वकीलों ने भी कोर्ट में संदीप सिंह की जमानत को लेकर विरोध किया। अदालत ने दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद फैसला 15 सितंबर तक सुरक्षित रख लिया है। मंत्री संदीप की अग्रिम जमानत याचिका खारिज होती है तो उन पर गिरफ्तारी की तलवार लटक जाएगी। मामले में 354 और 354-बी गैर-जमानती धाराएं लगाई गई है।
16 सितंबर को संदीप सिंह को पेश होने के लिए कहा
पुलिस की ओर से दाखिल की चार्जशीट के बाद कोर्ट ने 16 सितंबर को सुनवाई के दौरान आरोपी संदीप सिंह को भी हाजिर रहने के लिए कहा है। चंडीगढ़ पुलिस की एस.आई.टी. ने सी.जे.एम. की कोर्ट में चालान पेश किया है। चंडीगढ़ पुलिस ने संदीप सिंह को आई.पी.सी. की धारा 342, 354, 354ए, 354बी, 506 और 509 के तहत केस में आरोपी बनाया है। पुलिस ने 8 महीने के बाद 25 अगस्त को दर्ज केस में चार्जशीट दाखिल की थी।
याची संदीप सिंह ने जानबूझकर मामले से जुड़े तथ्य छिपाए
जूनियर महिला कोच के वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याची संदीप सिंह ने जानबूझकर मामले से जुड़े तथ्य छिपाए हैं। इसमें जांच एजैंसी को प्रभावित करने और सही तथ्यों को निर्धारित करने में सहयोग न करने वाली जानकारी शामिल है। आरोपी पुलिस के नोटिस के बाद 7 जनवरी, 10 फरवरी, 2 जून और 2 अगस्त को पुलिस जांच में शामिल हुआ था। उसके द्वारा पुलिस को दिए बयानों और जांच में सामने आए तथ्यों के बीच विरोधाभास है।वहीं, आरोपी का डिसेप्शन टेस्ट करने के लिए जांच एजैंसी ने अदालत में 10 मार्च को अर्जी भी दायर की थी। 13 अप्रैल को अंतिम अवसर पर आरोपी ने जवाब दायर कर टैस्ट से इंकार किया था। इसके बाद 5 मई को अर्जी का निपटारा हो गया। इससे पता चलता है कि आरोपी ने जांच एजैंसी को सहयोग नहीं किया।
दूसरी ओर अग्रिम जमानत का विशेषाधिकार होता है, जिसमें आरोपी के व्यवहार पर विचार करना सबसे अहम होता है। लाई डिसेप्शन टैस्ट की अर्जी पर लंबे समय तक जवाब न देना और बाद में मना करना दर्शाता है कि आरोपी सही तथ्य छिपा रहा है। आरोपी राज्य में मंत्री है और चुना हुआ प्रतिनिधि है। ऐसे में उसका दायित्व बनता था कि वह लाई टैस्ट करवाए। यदि पीड़िता के आरोप झूठे होते तो सच सामने आ सकता था।
वहीं, आरोपी ने जांच को प्रभावित करते हुए पीड़िता को बहकाते हुए रुपयों का प्रस्ताव दिया। अपने पद का प्रयोग करते हुए दबाव बनाया। उसे निलंबित किया गया और सी.आई.डी. विभाग के जरिए नजर रखी गई। इसके अलावा पीड़िता के खिलाफ झूठी शिकायत दायर की गई और बिना एफ.आई.आर. दर्ज किए एस.आई.टी. बना दी गई। यह सब पीड़िता का शोषण करने और उस पर दबाव बनाने के लिए किया गया। गैरकानूनी रूप से बनाई एस.आई.टी. के जरिए पीड़िता और उसके परिवार पर भी दबाव बनाया गया। यह सब इसलिए किया गया, ताकि पीड़िता शिकायत वापस ले ले। यही नहीं पीड़िता के मकान मालिकों को उसके खिलाफ पत्रकार वार्ता करने के लिए प्रभावित किया गया और पीड़िता की पहचान सार्वजनिक की गई। मामले में आरोपी को अग्रिम जमानत का लाभ दे दिया जाता है तो वह मुकद्दमे को भी प्रभावित कर सकता है। वहीं, पीड़िता को आरोप वापस लेने के लिए भी प्रभावित कर सकता है।