Edited By Sarita Thapa,Updated: 22 Feb, 2026 01:51 PM

भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को जो ज्ञान दिया, वह केवल युद्ध के लिए नहीं, बल्कि हर इंसान के सफल जीवन के लिए एक मार्गदर्शिका है। गीता के 16वें अध्याय के 21वें श्लोक में श्रीहरि ने ऐसे तीन मानसिक विकारों का वर्णन किया है, जिन्हें...
Bhagavad Gita Updesh : भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को जो ज्ञान दिया, वह केवल युद्ध के लिए नहीं, बल्कि हर इंसान के सफल जीवन के लिए एक मार्गदर्शिका है। गीता के 16वें अध्याय के 21वें श्लोक में श्रीहरि ने ऐसे तीन मानसिक विकारों का वर्णन किया है, जिन्हें नरक का द्वार कहा गया है। यदि कोई व्यक्ति इन तीन चीजों को समय रहते नहीं छोड़ता, तो न केवल उसका वर्तमान अशांत रहता है, बल्कि उसका भविष्य भी अंधकारमय हो जाता है। तो आइए जानते हैं क्या हैं वे तीन चीजें जिसे भगवान श्रीकृष्ण छोड़ने के लिए मना किया है।
काम (Lust/Extensive Desires)
यहां 'काम' का अर्थ केवल शारीरिक इच्छाओं से नहीं, बल्कि असीमित तृष्णा और वासना से है। जब इंसान अपनी इच्छाओं का गुलाम बन जाता है, तो वह सही और गलत का भेद भूल जाता है। अनियंत्रित इच्छाएं व्यक्ति को गलत रास्ते पर ले जाती हैं, जिससे अंततः पतन ही हाथ लगता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि संतोष ही शांति का मार्ग है।

क्रोध (Anger)
क्रोध यानी गुस्सा, इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन है। श्रीकृष्ण के अनुसार, क्रोध से भ्रम पैदा होता है, भ्रम से बुद्धि नष्ट होती है और जब बुद्धि का नाश होता है, तो इंसान स्वयं अपना विनाश कर बैठता है। गुस्से में लिया गया एक भी फैसला पूरे जीवन की मेहनत को राख कर सकता है। इसलिए, मन को शांत रखना ही नरक से बचने का उपाय है।
लोभ (Greed)
लालच या लोभ एक ऐसी भूख है जो कभी नहीं मिटती। लोभी व्यक्ति के पास चाहे कितना भी धन या वैभव आ जाए, वह कभी संतुष्ट नहीं होता। लोभ के कारण व्यक्ति अपनों को धोखा देता है, अनैतिक कार्य करता है और अंत में अकेला रह जाता है। लोभ इंसान की नैतिकता और सुकून, दोनों को खा जाता है।

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