धनतेरस पर मुख्य द्वार पर नहीं ! घर की इस दिशा में जलाएं यम का दीया, अकाल मृत्यु के भय से मिलेगी मुक्ति

Edited By Updated: 05 Nov, 2026 10:22 AM

dhanteras yam ka diya direction

सनातन धर्म में  धनतेरस का त्योहार सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना के लिए बहुत खास माना जाता है। इस दिन भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और भगवान कुंबेर की पूजा करने के साथ यमराज के नाम दीपदान करने की भी परंपरा है।

Dhanteras Yam Ka Diya Direction : सनातन धर्म में  धनतेरस का त्योहार सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना के लिए बहुत खास माना जाता है। इस दिन भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और भगवान कुंबेर की पूजा करने के साथ यमराज के नाम दीपदान करने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि धनतेरस की शाम यमराज के निमित्त दीपक जलाने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और परिवार  के सदस्यों को अच्छे सेहत और अच्छी आयु का आशीर्वाद मिलता है। हालांकि, बहुत से लोग इस बात को लेकर असमंजस में रहते हैं कि यमराज का दीपक घर के मुख्य द्वार पर जलाना चाहिए या किसी दूसरी जगह रखना चाहिए। शास्त्रीय और लोक परंपराओं में यम दीपदान के लिए दक्षिण दिशा को विशेष महत्व दिया गया है। ऐसे में धनतेरस पर दीपक जलाते समय दिशा और पूजा से जुड़े कुछ जरूरी नियमों का ध्यान रखना चाहिए। आइए जानते हैं यम दीपदान का महत्व और इसे करने की सही विधि।

यम का दीपक किस दिशा में जलाना चाहिए?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यमराज को दक्षिण दिशा का अधिपति माना जाता है। इसी वजह से धनतेरस के दिन उनके नाम का दीपक दक्षिण दिशा की ओर जलाने की परंपरा है। इस दीपक को घर के मुख्य द्वार पर सामान्य सजावटी दीपक की तरह रखने के बजाय घर के बाहर दक्षिण दिशा में रखा जाता है। मान्यता है कि इस विधि से यमराज प्रसन्न होते हैं और परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखते हैं। दीपदान करते समय दीपक की लौ दक्षिण दिशा की ओर रखी जाती है। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इस परंपरा को निभाने का तरीका थोड़ा अलग हो सकता है।

धनतेरस पर यम दीपदान का धार्मिक महत्व

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यम दीपदान की परंपरा का संबंध राजा हेम के पुत्र की कथा से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि राजा के पुत्र की कुंडली में विवाह के चौथे दिन मृत्यु का योग बताया गया था। जब उनकी पत्नी को इस बात का पता चला तो उन्होंने पति की रक्षा के लिए पूरी रात जागकर घर के बाहर सोने-चांदी के आभूषण और दीपक रख दिए। उन्होंने घर के चारों ओर रोशनी कर दी और रातभर अपने पति को जागते रखने के लिए कथाएं और गीत सुनाती रहीं। मान्यता है कि जब यमराज वहां पहुंचे तो दीपकों की चमक और आभूषणों की रोशनी से उनकी दृष्टि प्रभावित हुई। इस कारण वे राजकुमार के प्राण लिए बिना ही लौट गए। इसी कथा के आधार पर धनतेरस की रात यमराज के नाम दीपदान करने की परंपरा प्रचलित हुई। इसे यम दीपदान या यम दीपम भी कहा जाता है।

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