Dharmik Katha: इन दो गुणों को कभी न करें नजरअंदाज

Edited By Jyoti, Updated: 05 May, 2022 12:10 PM

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एक बार सम्राट चंद्रगुप्त चाणक्य से किसी बात पर चर्चा कर रहे थे कि अकस्मात चंद्रगुप्त ने चाणक्य से कहा, ‘‘आपकी विद्वता, सूझबूझ और चातुर्य की मैं दाद देता हूं। मगर कितना अच्छा होता, यदि भगवान ने

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एक बार सम्राट चंद्रगुप्त चाणक्य से किसी बात पर चर्चा कर रहे थे कि अकस्मात चंद्रगुप्त ने चाणक्य से कहा, ‘‘आपकी विद्वता, सूझबूझ और चातुर्य की मैं दाद देता हूं। मगर कितना अच्छा होता, यदि भगवान ने आपको सुन्दर रूप दिया होता।’’
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चाणक्य ने जान लिया राजा को अपने सौंदर्य का घमण्ड हो गया है और वे सौंदर्य के सामने विद्या को नगण्य समझ रहे हैं। चाणक्य ने सेवक को बुलाकर मिट्टी और सोने के एक-एक पात्र में जल लाने के लिए कहा। जल लाने पर चाणक्य ने राजा से पहले मिट्टी के पात्र का और बाद में स्वर्णपात्र का जल पीने के लिए कहा। फिर राजा से प्रश्र किया, महाराज किस पात्र का जल शीतल लगा? 

चंद्रगुप्त ने उत्तर दिया, मिट्टी के पात्र का।

इस पर चाणक्य ने कहा, महाराज वैसे तो दोनों ही पात्रों में डाला गया जल शीतल था किन्तु बाहर से सुन्दर दिखाई देने वाले स्वर्णपात्र का जल शीतल नहीं रहा, जबकि मिट्टी के पात्र का जल शीतल रहा। यह बात सौंदर्य और विद्या की है। सुन्दरता और कुरूपता का विद्या से कोई संबंध नहीं, बल्कि सौंदर्य से विद्या श्रेष्ठ है।
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अत: व्यक्ति को हमेशा समाज व परिवार में लोगों के अवगुणों को न ध्यान में रखतेहुए गुणों को महत्व देना चाहिए। सुन्दरता, पहनावा व रहन-सहन आदि को नजरअंदाज करते हुए विद्या, ज्ञान व गुणों को महत्व देना चाहिए।
 

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