गोवर्धन पूजा विशेष- इस मुनि के श्राप से घट रही गोवर्धन की लम्बाई

Edited By Updated: 13 Nov, 2015 10:10 AM

govardhan puja

श्रीकृष्ण ने अवतरण से पहले अपने निज-धाम चौरासी कोस भूमि, गोवर्धन और यमुना नदी को पृथ्वी पर भेजा। गोवर्धन भारत के पश्चिम प्रदेश में, शालमली द्वीप में द्रोण पर्वत के पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुए।

श्रीकृष्ण ने अवतरण से पहले अपने निज-धाम चौरासी कोस भूमि, गोवर्धन और यमुना नदी को पृथ्वी पर भेजा। गोवर्धन भारत के पश्चिम प्रदेश में, शालमली द्वीप में द्रोण पर्वत के पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुए। एक बार पुलस्त्य मुनि तीर्थ भ्रमण कर रहे थे। मार्ग में विचित्र पुष्प व फलों वाले वृक्षों एवं झरने वाले परम रमणीय द्रोणाचल-नन्दन गिरिराज गोवर्धन को देखकर बड़े प्रसन्न हुए।

मुनि द्रोणाचल से मिले और उनसे बोले - मैं काशी में रहता हूं, काशी में गंगाजी हैं और विश्वेश्वर महादेव जी हैं, वहां जाने से पापी लोग भी तत्क्षण मुक्त हो जाते हैं। मेरी इच्छा है कि मैं गोवर्धन को काशी में स्थापित पर उस पर तपस्या करूं। आप अपना पुत्र मुझे दान में दे दें। उस समय गोवर्धन का आकार आठ योजन (चौंसठ मील) लम्बा, पांच योजन तक फैला तथा दो योजन ऊंचा था। 

(आजकल गोवर्धन की लम्बाई सात मील देखी जाती है, हालांकि परिक्रमा का रास्ता चौदह मील का है)

गोवर्धन ने एक शर्त पर मुनि के साथ जाना स्वीकार किया, वह ये कि मुनि यदि भारी समझ कर उन्हें रास्ते में कहीं भी नीचे उतार देंगे तो गोवर्धन वहीं रह जाएंगे। पुलस्त्य मुनि ने गोवर्धन को अपनी हथेली पर उठाया और धीरे-धीरे काशी की ओर चलने लगे। मार्ग में वे वृजमण्डल आये।

वहां के अपूर्वे सौन्दर्य के दर्शन करते ही गोवर्धन को श्रीकृष्ण की बाल्यलीला, किशोर लीला आदि स्मरण हो आई। श्रीगोवर्धन की वहीं ठहरने की इच्छा हो गई। उन्होंने अपना भार इतना बढ़ाया कि उस भार से परेशान होकर मुनि अपनी प्रतिज्ञा भूल गए। मुनि ने प्रतिज्ञा की थी की वे रास्ते में गोवर्धन जी को नहीं उतारेंगे, सीधा काशी ले जाएंगे। अधिक भार होने के कारण मुनि ने श्रीगोवर्धन को वहीं उतार दिया। पुलस्त्य मुनि ने थकान के कारण थोड़ी देर विश्राम किया, फिर गोवर्धन को उनकी हथेली पर आने के लिए कहा।

श्रीगोवर्धन ने इन्कार कर दिया। मुनि फिर उन्हें अपनी शक्ति से उठाने का प्रयास किया किन्तु सफल नहीं हुए। अन्ततः मुनि ने क्रोध में श्राप दिया - तुमने मेरा मनोरथ पूर्ण नहीं किया इसलिए प्रतिदिन तुम्हारा तिल के समान आकार कम होता जाएगा। तभी से गोवर्धन पर्वत एक-एक तिल करके छोटे हो रहे हैं।

कहते हैं जब तक पृथ्वी पर भगीरथी गंगा और गोवर्धन गिरि हैं तब तक कहीं भी कलि के प्रभाव की प्रबलता नहीं होगी। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण जी ने श्रीगोवर्धन जी के तत्त्व को और उनकी महिमा को प्रकाशित किया है। श्रीकृष्ण ने ही देवताओं की पूजा बन्द करवाकर श्रीगोवर्धन पूजा का प्रवर्तन किया।

'गोवर्धन' शब्द का एक अर्थ इन्द्रीय-वर्द्धन भी होता है। इसलिए ऐसा भी कहा जाता है कि श्रीकृष्ण तथा कृष्ण-भक्तों के इन्द्रिय-वर्द्धन का नाम हो गोवर्धन पूजा है।

अखिल भारतीय श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ के सौजन्य से

श्री भक्ति विचार विष्णु जी महाराज

bhakti.vichar.vishnu@gmail.com

Related Story

Trending Topics

img title
img title

Be on the top of everything happening around the world.

Try Premium Service.

Subscribe Now!