Edited By Niyati Bhandari,Updated: 18 Mar, 2026 12:17 PM

Hindu New Year Navratri: चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होने वाले वासंतिक नवरात्र को हिंदू नववर्ष की शुरुआत माना जाता है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा कर भक्त आध्यात्मिक शक्ति और सिद्धि प्राप्त करते हैं।
Hindu New Year Navratri: चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक आने वाले नवरात्रों को वासन्तिक नवरात्र कहा जाता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को भारतीय नव-वर्ष के रूप में जाना जाता है। हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार इस दिन प्रथम बार सूर्य की किरणों ने पृथ्वी को स्पर्श किया तथा इस धरा पर मानवीय जीवन प्रारंभ हुआ। यज्ञ, साधना तथा तप के दृष्टिकोण से नवरात्रि पर्व के ये दिन अत्यंत शुभ माने गए हैं। इन 9 दिनों में मां आदि शक्ति भगवती दुर्गा की आराधना कर भक्त अभीष्ट सिद्धियां प्राप्त करते हैं। नवरात्रों में मां भगवती के नौ रूपों की उपासना होती है :
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चंद्रघंटेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥
इन नामों के उच्चारण से जो भगवती दुर्गा की शरण ग्रहण करता है, उसका कभी कोई अमंगल नहीं होता। वह सब प्रकार की विपत्तियों से मुक्त रहता है तथा मां के भक्तों को शोक, दुख और भय की प्राप्ति नहीं होती। मां जगदम्बा के रूप में पूजित मां आदि शक्ति ने ही इस जगत को व्याप्त कर रखा है। जो बुद्धि रूप से सब लोगों के हृदय में विराजमान रहने वाली, कल्याणदायिनी, शरणागतवत्सला, सृष्टि की पालन तथा संहार की शक्तिभूता सनातनी देवी हैं।
वह शंख, चक्र, गदा आदि उत्तम आयुधों को धारण करने वाली वैष्णवी शक्तिरूपा नारायणी हैं। वह त्रिभुवन की रक्षा हेतु तथा धर्म की स्थापना करने हेतु मधु कैटभ, महिषासुर तथा शुम्भ-निशुम्भ इत्यादि दैत्यों का नाश करने वाली हैं। सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी, सभी प्रकार की शक्तियों से सम्पन्न मां भगवती दुर्गा सब प्रकार से अपने भक्तों की रक्षा करती हैं।

या देवि सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता। नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:॥
जो देवी सब प्राणियों में विष्णुमाया के नाम से कही जाती हैं, उनको नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है। मां भगवती दुर्गा जी के अनुपम प्रभाव और बल का वर्णन करने में वेद और पुराण भी समर्थ नहीं हैं। पुण्यात्माओं के घर में लक्ष्मी रूप से, शुद्ध अंत:करण वाले पुरुषों के हृदयों में बुद्धि रूप से, सत्पुरुषों में श्रद्धा रूप से तथा कुलीन मनुष्यों में लज्जा रूप में मां भगवती दुर्गा निवास करती हैं। सम्पूर्ण यज्ञों में जिनके उच्चारण से सब देवता तृप्ति लाभ करते हैं वह ‘स्वाहा’ अग्नि स्वयं मां भगवती दुर्गा हैं तथा जो स्वधा रूप में पितरों की तृप्ति का कारण भी हैं।
सम्पूर्ण जगत की घोर पीड़ा का नाश करने वाली मां भगवती दुर्गा अपने भक्तों को दुर्गम भवसागर से पार कराने वाली हैं। जो महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती के रूप में सदैव अपने भक्तों पर कृपा बरसाती हैं। दुख तथा दरिद्रता को हरने वाली तथा समृद्धि एवं वैभव प्रदान करने वाली मां जगदम्बा का नवरात्र में पूजन कर समस्त भक्त सात्त्विक भाव में रह कर अपनी बुद्धि को श्रेष्ठ तथा कल्याण मार्ग में लगाते हैं।
भगवान श्री कृष्ण सात्त्विक बुद्धि के विषय में श्री गीता जी में कहते हैं कि जो बुद्धि कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को तथा बंधन और मोक्ष को जानती है, वह बुद्धि सात्त्विक है।
मनुष्य के भीतर जो रजोगुणी और तमोगुणी वृत्तियां हैं, उनसे निवृत्ति के लिए, नवरात्र के दिनों में मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाओं को भक्तिभाव एवं निष्काम भाव से मां भगवती की आराधना में लगाना, सात्त्विक धारण शक्ति कहलाता है। आध्यात्मिक तथा मानसिक शक्ति में वृद्धि के लिए यह सबसे शुभ अवसर है।
स्वास्थ्य की दृष्टि से भी संयमपूर्वक किया गया नवरात्र व्रतानुष्ठान अत्यंत लाभकारी है। जिस प्रकार से वेद अनादि हैं उसी प्रकार दुर्गा सप्तशती भी अनादि है, मार्कण्डेय पुराण के माध्यम से, दुर्गा सप्तशती के 13 अध्यायों के 700 श्लोकों के माध्यम से हमें प्रथम चरित्र मां महाकाली, मध्यम चरित्र मां महालक्ष्मी तथा उत्तम चरित्र मां महासरस्वती का पावन यश प्राप्त होता है।
भगवती महामाया देवी ज्ञानियों के भी चित्त को बलपूर्वक खींच कर मोह में डाल देती हैं। मां भगवती की कृपा प्राप्त करने तथा अभीष्ट सिद्धि प्राप्ति के लिए निम्नलिखित मंत्रों के द्वारा आराधना करनी चाहिए।

शरणागत दीनार्तपरित्राण परायणे। सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणी नमोस्तुते।
शरण में आए हुए दीनों एवं पीड़ितों की सदैव रक्षा करने वाली तथा सबके दुख हरने वाली नारायणी देवि! आपको नमस्कार है।
रामचरितमानस में माता सीता जी मां भगवती की स्तुति करते हुए कहती हैं-
जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी॥ जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता॥
-हे श्रेष्ठ पर्वतों के राजा हिमाचल की पुत्री पार्वती! आपकी जय हो, जय हो, हे महादेवजी के मुख रूपी चन्द्रमा की ओर टकटकी लगाकर देखने वाली चकोरी!
आपकी जय हो, हे हाथी के मुख वाले गणेशजी और छह मुख वाले स्वामिकार्तिकजी की माता! हे जगज्जननी! हे बिजली की सी कान्तियुक्त शरीर वाली! आपकी जय हो!
नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना॥
भव भव बिभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि॥
आपका न आदि है, न मध्य है और न अंत है। आपके असीम प्रभाव को वेद भी नहीं जानते। आप संसार को उत्पन्न, पालन और नाश करने वाली हैं। विश्व को मोहित करने वाली और स्वतंत्र रूप से विहार करने वाली हैं।
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या, विश्वस्य बीजं परमासि माया। सम्मोहितं देवि समस्तमेतत्, त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतु:॥
अर्थात - आप भगवान विष्णु की शक्ति हो और विश्व की बीज परममाया हो और आपने ही इस सम्पूर्ण जगत को मोहित कर रखा है। आपके प्रसन्न होने पर ही यह पृथ्वी मोक्ष को प्राप्त होती है। नवरात्र में दुर्गा सप्तशती का नियमित पाठ विधि-विधान से किया जाए तो माता बहुत प्रसन्न होती हैं। नवरात्र के इस पावन पर्व में मां भगवती जगतजननी आदि शक्ति मां जगदंबा की कृपा प्राप्त करने के लिए उनकी सेवा तथा आराधना की जाती है।
पावन पर्व नवरात्र में देवी दुर्गा की कृपा, सृष्टि की सभी रचनाओं पर समान रूप से बरसती है। आत्मशुद्धि के लिए नवरात्र पर्व में मां भगवती आदि शक्ति की पूजा अत्यन्त कल्याणकारी है। वास्तव में नवरात्र पर्व मन, बुद्धि और शरीर को स्वास्थ्य, सर्व-सुख सौभाग्य, आरोग्य और मंगल प्रदान करने वाला है।
नवरात्र पर्व में की गई भक्ति तथा तप अंत:करण को निर्मलता प्रदान करने वाला, तेज, धैर्य तथा शारीरिक तथा मानसिक शुद्धता प्रदान करने वाला है, जिससे मनुष्य के भीतर दैवीय सदगुणों का प्रादुर्भाव तथा नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है।
