Edited By Niyati Bhandari,Updated: 24 Feb, 2026 10:52 AM

Holashtak Katha: फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से पूर्णिमा तक के आठ दिनों को सनातन परंपरा में होलाष्टक कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह समय अत्यंत संवेदनशील माना गया है, इसलिए इन दिनों में विवाह, गृह प्रवेश, सगाई, नामकरण जैसे शुभ और...
Holashtak Katha: फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से पूर्णिमा तक के आठ दिनों को सनातन परंपरा में होलाष्टक कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह समय अत्यंत संवेदनशील माना गया है, इसलिए इन दिनों में विवाह, गृह प्रवेश, सगाई, नामकरण जैसे शुभ और मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं।
वर्ष 2026 में होलाष्टक की शुरुआत 24 फरवरी से होगी और 3 मार्च 2026 को होलिका दहन के साथ इसका समापन होगा। होलाष्टक से जुड़ी दो प्रमुख पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। भक्त प्रह्लाद की अटूट भक्ति और कामदेव दहन की घटना। इन दोनों कथाओं में भक्ति, तप, संयम और आत्मनियंत्रण का गहरा संदेश निहित है।
भक्त प्रह्लाद की कथा: अटूट भक्ति की परीक्षा
पुराणों के अनुसार असुरराज Hiranyakashipu हिरण्यकशिपु ने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया था। इस वरदान के प्रभाव से वह स्वयं को अजेय समझने लगा और अपने राज्य में आदेश दिया कि सभी लोग उसी की पूजा करें। लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। वह हर समय “नारायण” का जप करता और ईश्वर भक्ति को ही जीवन का लक्ष्य मानता था।
जब प्रह्लाद ने पिता के आदेश का पालन नहीं किया, तो हिरण्यकशिपु ने उसे कठोर दंड देने शुरू कर दिए। मान्यता है कि फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से ही उस पर अत्याचार आरंभ हुए। उसे पर्वत से गिराया गया, विषैले सर्पों के बीच डाला गया, हाथियों से कुचलवाने की कोशिश की गई और विष भी दिया गया, लेकिन हर बार भगवान विष्णु की कृपा से वह सुरक्षित बच निकला।
अंततः हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका की सहायता ली, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था। योजना के अनुसार होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठी, लेकिन वरदान का दुरुपयोग करने के कारण वह स्वयं जलकर भस्म हो गई और प्रह्लाद सुरक्षित रहे।
पूर्णिमा की रात्रि को घटी यह घटना आज होलिका दहन के रूप में मनाई जाती है। इन आठ दिनों को प्रह्लाद की कष्टपूर्ण परीक्षा का प्रतीक मानते हुए शुभ कार्यों से विरत रहने की परंपरा प्रचलित हुई।

कामदेव दहन की कथा: तप और संयम की शक्ति
होलाष्टक से जुड़ी दूसरी कथा भगवान शिव और कामदेव से संबंधित है। पौराणिक मान्यता के अनुसार माता सती के देह त्याग के बाद शिव जी गहन समाधि में लीन हो गए थे। उसी समय तारकासुर नामक असुर का अत्याचार बढ़ गया था। देवताओं को ज्ञात था कि उसका वध केवल शिव-पुत्र द्वारा ही संभव है।
देवताओं के अनुरोध पर कामदेव ने अपने पुष्प बाण से भगवान शिव की तपस्या भंग करने का प्रयास किया। जैसे ही शिवजी की समाधि भंग हुई, उन्होंने क्रोध में अपनी तीसरी आंख खोल दी। उस अग्नि की ज्वाला में कामदेव भस्म हो गए।
कामदेव की पत्नी रति के विलाप करने पर शिवजी ने प्रसन्न होकर उन्हें “अनंग” अर्थात सूक्ष्म रूप में पुनर्जीवन प्रदान किया। यह कथा बताती है कि तप, संयम और आत्मनियंत्रण की शक्ति सर्वोपरि है।

होलाष्टक का धार्मिक महत्व
होलाष्टक के दिनों को आत्मचिंतन, साधना और भक्ति का समय माना गया है। इन आठ दिनों में भोग-विलास और मांगलिक कार्यों से दूर रहकर व्यक्ति को अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखने की प्रेरणा दी जाती है।
भक्त प्रह्लाद की अटूट आस्था और कामदेव दहन की घटना दोनों ही यह संदेश देती हैं कि सच्ची भक्ति और संयम से कठिन से कठिन परिस्थितियों पर विजय पाई जा सकती है।
24 फरवरी से 3 मार्च 2026 तक चलने वाला होलाष्टक केवल वर्जनाओं का समय नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का अवसर है। यह काल हमें याद दिलाता है कि बाहरी उत्सव से पहले मन और आत्मा की पवित्रता अधिक महत्वपूर्ण है।
