Dhundiraj Chaturthi 2026: ढुण्ढिराज चतुर्थी व्रत पर पूजा के समय पढ़ें ये कथा, विघ्नहर्ता दूर करेंगे जीवन के सभी दुख

Edited By Updated: 21 Feb, 2026 12:11 PM

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Dhundiraj Chaturthi 2026: हिंदू धर्म में प्रत्येक मास की चतुर्थी तिथि भगवान गणेश को समर्पित होती है। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विशेष रूप से ढुण्ढिराज चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह पर्व आज 21 फरवरी को श्रद्धा और...

Dhundiraj Chaturthi 2026: हिंदू धर्म में प्रत्येक मास की चतुर्थी तिथि भगवान गणेश को समर्पित होती है। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विशेष रूप से ढुण्ढिराज चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह पर्व आज 21 फरवरी को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा।

धार्मिक मान्यता है कि इस दिन व्रत रखकर विधि-विधान से गणपति बप्पा की पूजा करने और व्रत कथा का पाठ करने से जीवन के सभी विघ्न दूर होते हैं तथा सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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ढुण्ढिराज कौन हैं?
गणेश जी के अनेक स्वरूपों में से एक स्वरूप “ढुण्ढिराज” के नाम से पूजित है। यह रूप विशेष रूप से काशी से जुड़ा हुआ माना जाता है। मान्यता है कि फाल्गुन शुक्ल चतुर्थी के दिन भगवान गणेश ने ढुण्ढिराज रूप में प्रकट होकर भक्तों का मार्गदर्शन किया था।

ढुण्ढिराज चतुर्थी का धार्मिक महत्व
इस दिन गणेश जी का व्रत रखने से बाधाएं दूर होती हैं। जीवन में आ रही समस्याओं से मुक्ति मिलती है। कार्यों में सफलता और परिवार में खुशहाली आती है। पूजा के समय व्रत कथा का पाठ करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

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ढुण्ढिराज चतुर्थी व्रत की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में शिव जी के मन में काशी नगरी को अपना निवास स्थान बनाने की इच्छा उत्पन्न हुई। उस समय काशी पर राजा दिवोदास का शासन था।

राजा दिवोदास अत्यंत धर्मात्मा, दयालु और न्यायप्रिय थे। उन्हें ब्रह्मा से वरदान प्राप्त था कि जब तक उनके राज्य में कोई अधर्म नहीं होगा, तब तक वहां किसी प्रकार की कमी नहीं आएगी और कोई भी देवता काशी में प्रवेश नहीं कर पाएगा।

भगवान शिव को काशी अत्यंत प्रिय थी, इसलिए उन्होंने अपने पुत्र गणेश जी को वहां भेजने का विचार किया। गणेश जी ने एक ज्योतिषी का वेश धारण किया और अपना नाम “ढुण्ढि” रखा।

काशी पहुंचकर उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता और ज्ञान से लोगों का मन जीत लिया। धीरे-धीरे वे काशी में चर्चा का केंद्र बन गए। इसी दौरान राजा दिवोदास के शासन में कमियां आने लगीं।

अंततः परिस्थितियां अनुकूल होने पर भगवान शिव काशी पहुंचे। उन्होंने गणेश जी को “ढुण्ढिराज” नाम से संबोधित किया और घोषणा की कि काशी आने वाले प्रत्येक भक्त की यात्रा तभी पूर्ण मानी जाएगी जब वह ढुण्ढिराज गणेश की पूजा करेगा।

मान्यता है कि जिस दिन भगवान शिव ने गणेश जी को ढुण्ढिराज नाम से पुकारा, वह फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि थी। तभी से इस दिन को ढुण्ढिराज चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है।

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ढुण्ढिराज चतुर्थी पूजा विधि
प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
घर के पूजा स्थल में गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करें।
रोली, अक्षत, दूर्वा, मोदक और फूल अर्पित करें।
“ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का जाप करें।
व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ करें।
अंत में आरती कर प्रसाद वितरित करें।

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व्रत का फल
धार्मिक मान्यता के अनुसार, ढुण्ढिराज चतुर्थी का व्रत रखने से:
जीवन के संकट दूर होते हैं।
मानसिक शांति और स्थिरता प्राप्त होती है।
कार्यों में आ रही बाधाएं समाप्त होती हैं।
परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है।

ढुण्ढिराज चतुर्थी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि आस्था और विश्वास का पर्व है। इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से भगवान गणेश की पूजा करने तथा व्रत कथा का पाठ करने से भक्तों को विशेष कृपा प्राप्त होने की मान्यता है।

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