Edited By Niyati Bhandari,Updated: 03 Mar, 2026 11:51 AM
Holika Devi Real Story: होलिका आखिर कौन थी। क्या वो एक देवी थी या फिर दैत्य हिरण्यकश्यप की दुष्ट बहन जिसने प्रह्लाद को मारने के लिए कुत्सित और अधार्मिक प्रयास किया था। जिसके पास एक दिव्य दुपट्टा था, जिसे पहन कर वो अपने ही भतीजे विष्णु भक्त प्रह्लाद...
Holika Devi Real Story: होलिका आखिर कौन थी। क्या वो एक देवी थी या फिर दैत्य हिरण्यकश्यप की दुष्ट बहन जिसने प्रह्लाद को मारने के लिए कुत्सित और अधार्मिक प्रयास किया था। जिसके पास एक दिव्य दुपट्टा था, जिसे पहन कर वो अपने ही भतीजे विष्णु भक्त प्रह्लाद को मारने के लिए चिता पर बैठी थी। क्या ये इतनी सरल कथा है या फिर ये सनातन हिंदू धर्म की एक भूली बिसरी वो कथा है, जिसे आज हम किसी ऐसे रुप में देख रहे हैं जो कभी थी ही नहीं..
कहीं ऐसा तो नहीं कि हमें एक देवी को दैत्य बना दिया क्योंकि आज भी हम होलिका दहन के अवसर पर होलिका को देवी मान कर उसकी पूजा करते हैं और उससे कल्याण की प्रार्थना करते हैं । नारद पुराण और भविष्य पुराण के इस होलिका स्तोत्र का पाठ होलिका दहन के अवसर पर करते हैं जो कुछ इस प्रकार है-
पापं तापं च दहनं कुरु कल्याणकारिणि | होलिके त्वं जगद्धात्री होलिकायै नमो नमः ||
होलिके त्वं जगन्माता सर्वसिद्धिप्रदायिनी | ज्वालामुखी दारूणा त्वं सुखशान्तिप्रदा भव ||
इस स्तोत्र में होलिका को जगद्धात्रि अर्थात इस जगत को धारण करने वाली कहा गया है। होलिका को जगत माता यानि जगत की माता कहते हुए उनकी स्तुति की गई है। होलिका को सर्व सिद्धि प्रदायिनी कहा गया है, सुख-शांति को देने वाली कहा गया है ।
इसी स्तोत्र के अगले भाग में उन्हें विष्णु और शंकर से पूजित बताया गया है-
वन्दितासि सुरेन्द्रेण ब्रह्मणा शंकरेण च। अतस्त्वं पाहिनो देवि भूते भूतिप्रदा भव ||
तो कहीं ऐसा तो नहीं कि हम जिन होलिका को आज दुष्ट और आसुरी शक्ति मानते हैं वो कोई ऐसी देवी हैं जिन्हें हमने भूला दिया है।
सनातन धर्म में होलिका को समझने के लिए हमें श्री दुर्गासप्तशती के प्रथम अध्याय के इस श्लोक को जरुर पढ़ना चाहिए जिसमें हिंदू धर्म के अंदर चार महारात्रियों की बात कही गई है-
प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी। कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्चा दारुणा॥
इस श्लोक में महामाया काली की स्तुति करते हुए कहा गया है कि आप ही प्रकृति के तीनों गुणों को उत्पन्न करने वाली हैं और आप ही काल रात्रि, महारात्रि, मोह रात्रि और दारुण रात्रि हैं।

ये प्रसंग उस वक्त का है जब विष्णु के कान के मैल से मधु-कैटभ उत्पन्न होते है और वो ब्रह्मा को मारने के लिए दौड़ते हैं तो ब्रह्मा उस महामाया देवी की स्तुति करते हैं जिन्होंने विष्णु को योगनिद्रा में सुला कर सारी सृष्टि का संचालन अपने हाथों में ले लिया था। ब्रह्मा की स्तुति पर विष्णु के आंखों, वक्ष और बाहुओं से एक महाशक्तिशाली देवी का प्राकट्य होता है जो दशपदी काली हैं , इन्हें ही महामाया भी कहा जाता है।
ये महामाया काली कौन हैं। ये ही विष्णु की वैष्णवी शक्ति हैं , यही विष्णु की ब्रह्म सहोदरी हैं । यही विष्णु की बहन हैं जो कृष्ण की बहन के रुप में योगमाया के रुप में अवतार लेती हैं। यही पार्वती बन कर शिव की शक्ति बनती हैं।
इन महामाया काली के बिना विष्णु का कोई भी बड़ा अवतार पृथ्वी पर नही हो सकता । विष्णु की शक्ति ही ये महामाया काली हैं। जिस प्रकार महाकाली की शक्ति के बिना शिव शव हैं उसी प्रकार महामाया काली के बिना विष्णु का कोई भी अवतार अपने उद्देश्यों को पूरा नहीं कर सकता है।
राम के समय में वो कैकयी के रुप में प्रगट होती हैं तो श्रीकृष्ण के समय में वो यशोदा के गर्भ से योगमाया दुर्गा के रुप में संसार को मोहित कर देती हैं। ककारादि काली सहस्त्रनाम में काली का एक नाम कैकयी भी है।
तो फिर सवाल ये उठता है कि होलिका का महामाया से आखिर क्या संबंध है। इसे समझने के लिए हमें शास्त्रो में बताए गए चार महारात्रियों के बारे में जानना चाहिए। चार महारात्रियों में कालरात्रि दिवाली की रात आती है। इस रात को महाकाली की पूजा की जाती है।

दूसरी महारात्रि शिवरात्रि को कहा जाता है। इसलिए नहीं कि इस दिन भगवान शिव की पूजा की जाती है , बल्कि इसलिए क्योंकि इस रात को महामाया काली पार्वती के रुप में शिव से विवाह करती हैं और वैरागी शिव गृहस्थ बन कर संसार का संहार कार्य हमेशा के लिए रोक देते हैं।
तीसरी महारात्रि कृष्ण जन्माष्टमी की रात आती है जिसे मोहरात्रि कहा जाता है। ये महारात्रि इसलिए नहीं है कि इस रात को श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था बल्कि इसलिए कि इसी रात को यशोदा के गर्भ से विष्णु की महामाया ने योगमाया के रुप में अवतार लिया था और श्रीकृष्ण के अवतरण को सफल बनाया था।
आखिरी महारात्रि होली की रात को आती है जिसे दारुण महारात्रि भी कहा जाता है। आखिर इसे दारुण महारात्रि क्यों कहते हैं इसे समझने के लिए हमें होलिका देवी के मूल स्वरुप को जानना होगा। होलिका और कोई नहीं बल्कि विष्णु की महामाया काली हैं जो प्रत्यंगिरा देवी के स्वरुप में आती हैं ।
इन्हें ही नृसिंही देवी भी कहा जाता है। महामाया काली का ये स्वरूप अपने सभी रूपों में सबसे दारुण यानी उग्र और भयंकर है ।इसलिए इस रात्रि को उनके इस दारुण रूप के अवतरण की वजह से दारुण महारात्री कहा गया है।
प्रत्यंगिरा सहस्त्रनाम में देवी को ‘होरी होत्रि होलिका च होमा होम्या हविर्हरि’ कह कर उनकी स्तुति की गई है। इस श्लोक में उन्हें होलिका कह कर संबोधित किया गया है।
होलिका दहन और होली की रात को दारुण रात्रि इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन प्रत्यंगिरा देवी के रुप में होलिका ने प्रह्लाद को मारा नहीं था बल्कि हिरण्यकश्यप आदि दैत्यों को अपनी माया से सम्मोहित कर प्रह्लाद की रक्षा की थी और खुद अग्नि में विलीन हो गई थीं ।
यही देवी फिर से वैशाख मास के शुक्ल चतुर्दशी को नृसिंही देवी के रुप में भगवान नृसिंह के साथ ही प्रगट होती हैं । जब भगवान नृसिंह हिरण्यकश्यप का वध करने के बाद अपने क्रोध से संसार का विनाश करना शुरु करते हैं तो उन्हें रोकने के लिए भगवान शिव शरभ पशु का अवतार लेते हैं।
इसके बाद भी जब नृसिंह देव के क्रोध को वो खत्म नहीं कर पाते तो वो भेरुंड पक्षी का अवतार लेते हैं और नृसिंह देव से युद्ध करते हैं। इसमें भी जब शिव और नृसिंह एक-दूसरे के क्रोध को खत्म नहीं कर पाते तो नृसिंही देवी के रुप में काली शिव से भेरुंड अवतार शरीर से निकलती हैं और नृसिंही देवी के रुप में इन दोनों को अपना विकराल रुप दिखाती हैं और इनकी अपरिमित शक्ति को देख नृसिंह और शिव दोनों ही शांत हो जाते हैं।
नृसिंही देवी ही प्रत्यंगिरा देवी हैं और वही होलिका देवी भी हैं। ये महामाया काली के अलग अलग स्वरुप हैं। इनके दारुण और भयंकर रुप की वजह से ही होली की रात को दारुण महारात्रि कहा जाता है। प्रत्यंगिरा देवी या नृसिंही बड़े से बड़े जादू टोने या तंत्र के प्रभाव को खत्म कर देती हैं। इन्हें ही अथर्वण भद्रकाली भी कहा जाता है । अथर्ववेद में इनकी बड़ी महिमा गाई गई है।
होलिका दहन की रात इन्हीं देवी की पूजा की जाती थी जो आज एक आसुरी होलिका की पूजा के रुप में बदल गई है।
आचार्य पंडित सुधांशु तिवारी
प्रश्न कुण्डली विशेषज्ञ/ ज्योतिषाचार्य
