भगवान गणेश की पूजा से ही क्यों शुरू किया जाता है हर मांगलिक कार्य ? पढ़ें इसके पीछे की रोचक कथा

Edited By Updated: 19 Feb, 2026 01:03 PM

why ganpati first worship

भारतीय संस्कृति में एक कहावत बहुत मशहूर है- किसी भी काम का श्रीगणेश करना। इसका अर्थ ही यही है कि कार्य की शुरुआत भगवान गणपति के नाम से हो। चाहे विवाह का मंडप हो, नए घर की नींव हो या कोई बड़ी पूजा, सबसे पहली आहुति और वंदना हमेशा एकदंत के नाम ही होती...

Why Ganpati First Worship : भारतीय संस्कृति में एक कहावत बहुत मशहूर है- किसी भी काम का श्रीगणेश करना। इसका अर्थ ही यही है कि कार्य की शुरुआत भगवान गणपति के नाम से हो। चाहे विवाह का मंडप हो, नए घर की नींव हो या कोई बड़ी पूजा, सबसे पहली आहुति और वंदना हमेशा एकदंत के नाम ही होती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कोटि-कोटि देवी-देवताओं के इस संसार में, शिव-पार्वती के छोटे पुत्र गणेश को ही प्रथम पूज्य होने का विशेषाधिकार क्यों मिला। यह केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि इसके पीछे बुद्धि के बल, माता-पिता के प्रति अटूट भक्ति और महादेव के एक दिव्य वरदान की अद्भुत गाथा छिपी है। गणेश जी का प्रथम पूजन हमें सिखाता है कि सफलता के लिए केवल शारीरिक वेग नहीं, बल्कि विवेक और चतुर बुद्धि की आवश्यकता होती है। तो आइए जानते हैं उस पौराणिक कथा के बारे में, जिसने एक बालक को समस्त ब्रह्मांड का सबसे पूजनीय देव बना दिया।

Why Ganpati First Worship

प्रथम पूज्य बनने की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार समस्त देवताओं के बीच यह प्रश्न उठा कि धरती पर सबसे पहले किसकी पूजा होनी चाहिए। इस विवाद को सुलझाने के लिए भगवान शिव ने एक प्रतियोगिता रखी। उन्होंने कहा, "जो भी अपने वाहन पर बैठकर पूरे ब्रह्मांड की तीन बार परिक्रमा करके सबसे पहले मेरे पास लौटेगा, वही 'प्रथम पूज्य' कहलाएगा।"

घोषणा सुनते ही शिव के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय अपने तीव्रगामी वाहन मयूर पर सवार होकर ब्रह्मांड नापने निकल पड़े। दूसरी ओर, गणेश जी का वाहन 'मूषक' था और उनका शरीर भारी था। कार्तिकेय से दौड़ में जीतना लगभग असंभव था। लेकिन गणेश जी 'बुद्धि के देवता' हैं। उन्होंने अपनी चतुर बुद्धि का परिचय दिया और कहीं जाने के बजाय अपने माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती को एक साथ बिठाया और भक्ति भाव से उनकी तीन परिक्रमा पूरी कर ली।

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जब महादेव ने उनसे पूछा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया, तो गणेश जी ने उत्तर दिया "माता-पिता के चरणों में ही समस्त ब्रह्मांड और समस्त लोक समाहित हैं। उनकी सेवा और परिक्रमा करना, पूरे विश्व की परिक्रमा करने के समान है।"

गणेश जी के इस तर्क और माता-पिता के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा को देखकर महादेव अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने वरदान दिया कि आज से किसी भी मांगलिक या शुभ कार्य में सबसे पहले गणेश की पूजा की जाएगी और जो ऐसा नहीं करेगा, उसका कार्य निर्विघ्न संपन्न नहीं होगा।

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