Mahashivratri 2026: इस मंदिर में हुआ था शिव-पार्वती का दिव्य विवाह, तीन युगों से जल रही है विवाह की साक्षी अखंड अग्नि

Edited By Updated: 06 Feb, 2026 05:57 PM

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Mahashivratri 2026: महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के पावन विवाह का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इस विशेष रात्रि में देवों के देव महादेव अपनी अर्धांगिनी माता पार्वती के साथ धरती लोक पर भ्रमण करते हैं और सच्चे मन से व्रत-पूजा...

Mahashivratri 2026: महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के पावन विवाह का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इस विशेष रात्रि में देवों के देव महादेव अपनी अर्धांगिनी माता पार्वती के साथ धरती लोक पर भ्रमण करते हैं और सच्चे मन से व्रत-पूजा करने वाले भक्तों को विशेष आशीर्वाद प्रदान करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह किस स्थान पर हुआ था? शिव पुराण में इस रहस्य का उल्लेख मिलता है।

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महाशिवरात्रि 2026 कब है?
साल 2026 में महाशिवरात्रि का पर्व 15 फरवरी को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा। इस दिन देश-भर के शिव मंदिरों में विशेष पूजा, रुद्राभिषेक और जागरण का आयोजन किया जाएगा।

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शिव-पार्वती विवाह का पावन स्थल कौन-सा है?
शिव महापुराण के अनुसार, भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह देवभूमि उत्तराखंड में संपन्न हुआ था। जिस स्थान पर यह दिव्य विवाह हुआ, उसे आज त्रियुगीनारायण मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है और पौराणिक, धार्मिक व आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

त्रियुगीनारायण मंदिर की विशेषताएं
करीब 1980 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर शांत पर्वतों, देवदार के घने जंगलों और दिव्य वातावरण से घिरा हुआ है। यह स्थान न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि हाल के वर्षों में डेस्टिनेशन वेडिंग के लिए भी तेजी से लोकप्रिय हुआ है।

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इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है —
अखंड विवाह अग्नि (अखंड धूनी)
मंदिर के सामने बने हवन कुंड में जलने वाली यह अग्नि कभी बुझती नहीं।
तीन युगों से जल रही है विवाह की साक्षी अग्नि

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी हवन कुंड की अग्नि को भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह का साक्षी माना जाता है। कहा जाता है कि यह दिव्य अग्नि त्रेतायुग से लगातार प्रज्वलित है। भक्त इस पवित्र अग्नि में समिधा अर्पित करते हैं और यहां से प्राप्त भस्म को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

देवताओं की उपस्थिति में हुआ था विवाह
शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मा जी ने विवाह संपन्न कराया। भगवान विष्णु ने माता पार्वती का कन्यादान किया। समस्त देवी-देवता, गंधर्व, ऋषि-मुनि, नंदी और शिवगण इस विवाह में उपस्थित थे। इसी कारण महाशिवरात्रि को शिव-पार्वती के पावन मिलन का महापर्व माना जाता है।

महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व
मान्यता है कि महाशिवरात्रि की रात्रि विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। दांपत्य जीवन सुखमय बनता है। मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। जीवन के दुख-कष्ट समाप्त होते हैं।

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