Bhimseni Ekadashi: जानें, कैसे आरंभ हुआ निर्जला एकादशी व्रत

Edited By Niyati Bhandari, Updated: 08 Jun, 2022 09:03 AM

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हिन्दू माह के ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को किया जाने वाला निर्जला एकादशी व्रत बहुत कठिन होता है। इस व्रत का मात्र धार्मिक महत्व ही नहीं है बल्कि मानसिक और

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Pandava Ekadashi: हिन्दू माह के ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को किया जाने वाला निर्जला एकादशी व्रत बहुत कठिन होता है। इस व्रत का मात्र धार्मिक महत्व ही नहीं है बल्कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के नजरिए से भी बहुत महत्व है। भगवान विष्णु को समर्पित यह व्रत मन को संयम सिखा एक नई ऊर्जा देता है। यह व्रत पुरुष व महिला दोनों द्वारा किया जा सकता है। यह व्रत द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक चलता है, तत्पश्चात दान पुण्य के बाद यह व्रत सम्पूर्ण होता है। 

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ये है व्रत कथा
पांडवों में शक्तिशाली भीम के पेट में वृक नामक अग्नि स्थापित थी जिस कारण उन्हें वृकोदर भी कहा जाता था। उन्होंने नागलोक के दस कुंडों का जल भी पी रखा था जिससे उनके शरीर में दस हजार हाथियों के समान बल आ गया था। यही वजह थी कि वह शीघ्र ही भोजन पचाने की क्षमता रखते थे। सभी अन्य पांडव व द्रौपदी हर एकादशी को व्रत करते थे लेकिन भीम के लिए यह व्रत कठिन था क्योंकि वह एक पल भी भूखे नहीं रह सकते थे।

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ऐसे में महर्षि वेद व्यास जी ने उन्हें निर्जला एकादशी का व्रत रखने की सलाह दी और कहा कि इस व्रत से तुम्हें पूरे वर्ष की एकादशियों का फल प्राप्त होगा। भीम ने इस व्रत को पूरी श्रद्धा से किया, तभी तो यह एकादशी पांडव एकादशी के रूप में भी जानी जाती है।     

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