Edited By Niyati Bhandari,Updated: 14 Mar, 2026 02:55 PM

Ramayan Katha: हिंदू धर्मग्रंथों में भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े अनेक प्रेरणादायक प्रसंग मिलते हैं, जो भक्ति, त्याग और धर्म के मार्ग का संदेश देते हैं। ऐसा ही एक प्रसिद्ध प्रसंग उस समय का है जब लंकापति रावण को पराजित करने से पहले भगवान श्रीराम ने...
Ramayan Katha: हिंदू धर्मग्रंथों में भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े अनेक प्रेरणादायक प्रसंग मिलते हैं, जो भक्ति, त्याग और धर्म के मार्ग का संदेश देते हैं। ऐसा ही एक प्रसिद्ध प्रसंग उस समय का है जब लंकापति रावण को पराजित करने से पहले भगवान श्रीराम ने मां दुर्गा की आराधना की थी।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, रावण अत्यंत शक्तिशाली और भगवान शिव का परम भक्त था। ऐसे में उसे युद्ध में हराना आसान नहीं था। यही कारण था कि लंका पर चढ़ाई से पहले भगवान राम ने देवी दुर्गा की विशेष पूजा की थी, जिसे अकाल बोधन कहा जाता है। इस पूजा के दौरान भगवान राम की भक्ति की ऐसी परीक्षा हुई कि उन्होंने अपनी आंख तक देवी को अर्पित करने का संकल्प कर लिया था।
जब मां दुर्गा को किया गया जागृत
पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान राम और रावण के बीच युद्ध होने वाला था, तब विभीषण ने श्रीराम को सलाह दी कि रावण जैसे शक्तिशाली योद्धा को पराजित करने के लिए मां दुर्गा की आराधना करना आवश्यक है।
विभीषण की सलाह मानकर भगवान राम ने शारदीय नवरात्रि के समय देवी दुर्गा का अकाल बोधन किया। अकाल बोधन का अर्थ है असमय देवी को जागृत कर उनकी विशेष पूजा करना। इस पूजा का उद्देश्य लंका विजय के लिए देवी की कृपा प्राप्त करना था।

108 नीलकमल और देवी की परीक्षा
कथा के अनुसार, पूजा के संकल्प के तहत भगवान राम को मां दुर्गा को 108 नीलकमल अर्पित करने थे। जब पूजा अपने अंतिम चरण में थी, तब देवी दुर्गा ने भगवान राम की भक्ति की परीक्षा लेने का निश्चय किया।
देवी की माया से पूजा स्थल से एक नीलकमल गायब हो गया। जब भगवान राम ने देखा कि 108वां नीलकमल नहीं है, तो उन्होंने बिना विचलित हुए अपना संकल्प पूरा करने का निर्णय लिया।
भगवान राम को कमल नयन कहा जाता है, क्योंकि उनकी आंखें कमल के समान सुंदर मानी जाती हैं। ऐसे में उन्होंने यह विचार किया कि अपनी एक आंख को ही नीलकमल के रूप में देवी को अर्पित कर देंगे।

जब भगवान राम ने उठाया बाण
कथा के अनुसार, जैसे ही भगवान राम ने अपनी आंख निकालने के लिए बाण उठाया, उसी समय मां दुर्गा प्रकट हो गईं।
भगवान राम की निस्वार्थ भक्ति और अटूट समर्पण देखकर देवी अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्होंने प्रभु राम का हाथ थाम लिया और उन्हें रावण पर विजय प्राप्त करने का आशीर्वाद दिया।
रावण की चूक और राम की विजय
एक ओर जहां भगवान राम पूर्ण श्रद्धा और भक्ति से देवी दुर्गा की साधना कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर रावण भी अपनी विजय सुनिश्चित करने के लिए चंडी पाठ कर रहा था।
लेकिन कहा जाता है कि रावण के अहंकार और पूजा के दौरान मंत्रों के उच्चारण में हुई एक छोटी सी गलती उसकी हार का कारण बन गई। अंततः देवी दुर्गा ने धर्म के मार्ग पर चलने वाले भगवान राम का साथ दिया और रावण का विनाश हुआ।
यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति, समर्पण और धर्म के मार्ग पर चलने से अंततः सत्य और अच्छाई की ही विजय होती है।
