Ramayana Untold Story: हनुमान जी को देखकर क्यों कांप उठा भरत का हाथ? जानें भावुक कथा

Edited By Updated: 21 Jan, 2026 10:04 AM

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Bharat and Hanuman Katha: रामायण केवल युद्ध, विजय और धर्म की कथा नहीं है, बल्कि यह विवेक, करुणा और उत्तरदायित्व का भी जीवंत ग्रंथ है। इसके कई प्रसंग ऐसे हैं, जो कम चर्चित होने के बावजूद जीवन को गहरी सीख देते हैं। ऐसी ही एक मार्मिक और अनसुनी कथा...

Bharat and Hanuman Katha: रामायण केवल युद्ध, विजय और धर्म की कथा नहीं है, बल्कि यह विवेक, करुणा और उत्तरदायित्व का भी जीवंत ग्रंथ है। इसके कई प्रसंग ऐसे हैं, जो कम चर्चित होने के बावजूद जीवन को गहरी सीख देते हैं। ऐसी ही एक मार्मिक और अनसुनी कथा जुड़ी है भरत और हनुमान जी से, जब अनजाने में भरत के हाथ से ऐसा कार्य होने वाला था, जिससे पूरे युद्ध का परिणाम बदल सकता था।

यह प्रसंग न केवल भरत की चेतना और विवेक को दर्शाता है, बल्कि राजा दशरथ की दी हुई सीख की शक्ति को भी उजागर करता है।

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लक्ष्मण को बचाने की दौड़ और अयोध्या का वह क्षण
लंका युद्ध के दौरान जब मेघनाद के प्रहार से लक्ष्मण मूर्छित हो गए थे, तब वैद्य सुषेण ने बताया कि यदि सूर्योदय से पहले संजीवनी बूटी न मिली, तो लक्ष्मण के प्राण नहीं बचेंगे। इसी संकट की घड़ी में पवनपुत्र हनुमान संजीवनी की खोज में द्रोणागिरि पर्वत उठा लाए और उसे लेकर आकाश मार्ग से लंका की ओर उड़ चले।

उड़ान के दौरान जब हनुमान जी अयोध्या के ऊपर से गुजरे, तो उनका विशाल पर्वत और छाया देखकर पूरे आकाश में अंधकार छा गया। उस समय अयोध्या की रक्षा का दायित्व भरत संभाल रहे थे।

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भरत को क्यों हुआ संदेह?
अचानक छाए अंधकार और उड़ते पर्वत को देखकर भरत को शंका हुई कि कोई मायावी राक्षस अयोध्या पर आक्रमण करने या उसे नष्ट करने के लिए पर्वत उठा ले जा रहा है। एक क्षत्रिय और कुशल योद्धा होने के नाते भरत जानते थे कि यदि यह शत्रु हुआ, तो एक ही बाण में उसका अंत किया जा सकता है लेकिन यहीं भरत का विवेक जाग उठा।

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क्यों चलाया बिना नोक वाला बाण?
भरत ने हनुमान जी पर मारक बाण नहीं, बल्कि बिना नोक वाला बाण (सायक) चलाया। इसके पीछे दो महत्वपूर्ण कारण थे—

पूर्ण निश्चय का अभाव:
भरत को यह पूरी तरह निश्चित नहीं था कि आकाश में उड़ने वाला कोई शत्रु ही है। उन्हें लगा कि यदि वह कोई मित्र या देवदूत हुआ, तो घातक बाण चलाना महापाप होगा।

राजा दशरथ की सीख:
बचपन में राजा दशरथ ने भरत को अपनी सबसे बड़ी भूल के बारे में बताया था। दशरथ ने अनजाने में शब्दभेदी बाण चलाकर श्रवण कुमार की हत्या कर दी थी, यह सोचकर कि कोई जंगली पशु पानी पी रहा है। उसी पाप के कारण उन्हें पुत्र वियोग का श्राप मिला।

दशरथ ने भरत को सिखाया था, “जब तक शंका पूर्ण रूप से दूर न हो जाए, तब तक कभी प्राणघातक बाण न चलाना।”

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राम नाम ने टाल दिया अनर्थ
भरत का बाण लगते ही हनुमान जी ‘राम-राम’ का जाप करते हुए नीचे गिर पड़े। राम का नाम सुनते ही भरत स्तब्ध रह गए। वे तुरंत हनुमान जी के पास पहुंचे, उन्हें उठाया और क्षमा मांगी।

जब भरत को पता चला कि ये पवनपुत्र हनुमान हैं और उनके प्रिय भाई भगवान राम के कार्य के लिए संजीवनी ले जा रहे हैं, तो भरत की आंखों से आंसू छलक पड़े। उन्होंने अपने विवेक और पिता की सीख से एक महापाप और महाविनाश को होने से रोक लिया।

यदि उस दिन भरत ने घातक बाण चलाया होता, तो लक्ष्मण के प्राण बचाना असंभव हो जाता।

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