Edited By Prachi Sharma,Updated: 18 Nov, 2025 03:20 PM

अनुवाद : जो परब्रह्म के ज्ञाता हैं, वे अग्निदेव के प्रभाव में, प्रकाश में, दिन के शुभक्षण में, शुक्लपक्ष में या जब सूर्य उत्तरायण रहता है, उन छह मासों में इस संसार से शरीर त्याग करने पर उस परब्रह्म को प्राप्त करते हैं।
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अग्नि ज्योति रह: शुक्ल: षण्मासा उत्तरायणम्।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः:॥8.24॥
अनुवाद : जो परब्रह्म के ज्ञाता हैं, वे अग्निदेव के प्रभाव में, प्रकाश में, दिन के शुभक्षण में, शुक्लपक्ष में या जब सूर्य उत्तरायण रहता है, उन छह मासों में इस संसार से शरीर त्याग करने पर उस परब्रह्म को प्राप्त करते हैं।
तात्पर्य : जब अग्नि, प्रकाश, दिन तथा पक्ष का उल्लेख रहता है, तो यह समझना चाहिए कि इस सबों के अधिष्ठाता देव होते हैं जो आत्मा की यात्रा की व्यवस्था करते हैं। मृत्यु के समय मन मनुष्य को नवीन जीवन मार्ग पर ले जाता है।

यदि कोई अकस्मात या योजनापूर्वक उपर्युक्त समय पर शरीर त्याग करता है तो उसके लिए निॢवशेष ब्रह्मज्योति प्राप्त कर पाना संभव होता है। योग में सिद्ध योगी अपने शरीर को त्यागने के समय तथा स्थान की व्यवस्था कर सकते हैं। अन्यों का इस पर कोई वश नहीं होता।
यदि संयोगवश वे शुभमुहूर्त में शरीर त्यागते हैं, तब तो उनको जन्म-मृत्यु के चक्र में लौटना नहीं पड़ता, अन्यथा उनके पुरावर्तन की संभावना बनी रहती है। किन्तु कृष्णभावनामृत में शुद्धभक्त के लिए लौटने के लिए कोई भय नहीं रहता, चाहे वह शुभ मुहूत्र्त में शरीर त्याग करे या अशुभ क्षण में अकस्मात शरीर त्याग करे अथवा स्वेच्छापूर्वक।
