Edited By Sarita Thapa,Updated: 16 Jan, 2026 04:37 PM

अनुवाद : श्रीभगवान ने कहा : हे अर्जुन ! चूंकि तुम मुझसे कभी ईष्र्या नहीं करते, इसलिए मैं तु हें यह परम गुह्यज्ञान तथा अनुभूति बतलाऊंगा, जिसे जानकर तुम संसार के सारे क्लेशों से मुक्त हो जाओगे।
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्या यनसूयवे।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥9.1॥
अनुवाद : श्रीभगवान ने कहा : हे अर्जुन ! चूंकि तुम मुझसे कभी ईष्र्या नहीं करते, इसलिए मैं तु हें यह परम गुह्यज्ञान तथा अनुभूति बतलाऊंगा, जिसे जानकर तुम संसार के सारे क्लेशों से मुक्त हो जाओगे।
तात्पर्य : ज्यों-ज्यों भक्त भगवान के विषयों में अधिकाधिक सुनता है त्यों-त्यों वह आत्म प्रकाशित होता जाता है। यह श्रवण विधि श्रीमद्भागवत में इस प्रकार अनुमोदित है : भगवान की कथा शक्तियों से पूरित होती है, जिनकी अनुभूति तभी होती है जब भक्त भगवान संबंधी इन कथाओं की परस्पर चर्चा करते हैं।
भगवान उस जीव विशेष की मानसिकता तथा निष्ठा से अवगत रहते हैं, जो कृष्णभावनाभावित होता है और उसे ही वे भक्तों के सान्निध्य में कृष्णविद्या को समझने की बुद्धि प्रदान करते हैं। कृष्ण की चर्चा अत्यंत शक्तिशाली है और यदि सौभाग्यवश किसी को ऐसी संगति प्राप्त हो जाए तो वह आत्म साक्षात्कार की दिशा में अवश्य प्रगति करेगा।
जिसे कृष्ण का यह परमगुह्य ज्ञान प्राप्त है, वह दिव्य पुरुष है, अत: इस संसार में रहते हुए भी उसे भौतिक क्लेश नहीं सताते। भक्तिरसामृत सिंधू में कहा गया है कि जिसमें भगवान की प्रेमाभक्ति करने की उत्कृष्ट इच्छा होती है वह भले ही इस जगत में बद्ध अवस्था में रहता हो, किन्तु उसे मुक्त मानना चाहिए।

इस प्रथम श्लोक का विशिष्ट महत्व है। इदं ज्ञानम् (यह ज्ञान) शब्द शुद्धभक्ति के द्योतक हैं जो नौ प्रकार की होती हैं - श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद-सेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, स य तथा आत्म समर्पण। भक्ति के इन नौ तत्वों का अ यास करने से मनुष्य आध्यात्मिक चेतना अथवा कृष्ण भावनामृत तक उठ पाता है। इस प्रकार जब मनुष्य का हृदय भौतिक कल्मष से शुद्ध हो जाता है तो वह कृष्णविद्या को समझ सकता है।
श्लोक का अनसूयवे शब्द भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। सामान्यतया बड़े से बड़े विद्वान भाष्यकार भी भगवान कृष्ण से ईष्र्या करते हैं। कोई भी ऐसा व्यक्ति जो कृष्ण के प्रति ईष्र्यालु है, न तो भगवद्गीता की व्या या कर सकता है न पूर्ण ज्ञान प्रदान कर सकता है। जो व्यक्ति कृष्ण को जाने बिना उनके चरित्र की आलोचना करता है, वह मूर्ख है। अत: ऐसी टीकाओं से सावधान रहना चाहिए।
जो व्यक्ति समझते हैं कि कृष्ण भगवान हैं और शुद्ध तथा दिव्य पुरुष हैं उनके लिए ये अध्याय लाभप्रद होंगे।

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