Vat Savitri Vrat 2026 : कब रखा जाएगा वट सावित्री का व्रत, जानें पूजा की सही तिथि और शुभ मुहूर्त

Edited By Updated: 13 Apr, 2026 02:10 PM

vat savitri vrat 2026

भारतीय परंपरा में वट सावित्री व्रत केवल एक उपवास नहीं, बल्कि त्याग, प्रेम और अटूट संकल्प का महापर्व है। यह पावन दिन सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इसी दिन सावित्री ने अपनी बुद्धिमानी और दृढ़ निश्चय से यमराज के हाथों से अपने पति...

Vat Savitri Vrat 2026 : भारतीय परंपरा में वट सावित्री व्रत केवल एक उपवास नहीं, बल्कि त्याग, प्रेम और अटूट संकल्प का महापर्व है। यह पावन दिन सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इसी दिन सावित्री ने अपनी बुद्धिमानी और दृढ़ निश्चय से यमराज के हाथों से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस छीन लिए थे। मान्यता है कि जो भी महिला पूरी श्रद्धा के साथ वट वृक्ष की पूजा करती है, उसके वैवाहिक जीवन में आने वाली हर बाधा दूर हो जाती है और दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है। तो आइए जानते हैं वट सावित्री के तिथि और शुभ मुहूर्त के बारे में-

Vat Savitri Vrat 2026

वट सावित्री व्रत 2026 डेट और शुभ मुहूर्त 
पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि का प्रारंभ 16 मई को सुबह 05 बजकर 11 मिनट पर होगी और इसका समापन 17 मई को रात 01 बजकर 30 मिनट पर होगा। ऐसे में वट सावित्री व्रत 16 मई को किया जाएगा।

वैवाहिक जीवन के लिए क्यों है यह खास?
अटूट विश्वास: जिस प्रकार सावित्री ने यमराज से तर्क कर सत्यवान के प्राण बचाए, यह व्रत पति-पत्नी के बीच अटूट विश्वास और समर्पण को बढ़ाता है।

वट वृक्ष का महत्व: बरगद के पेड़ को 'अक्षय' माना जाता है, जिसकी आयु सबसे लंबी होती है। इसकी पूजा करने से वैवाहिक संबंध भी लंबी आयु तक सुरक्षित रहते हैं।

त्रिदेवों का वास: मान्यता है कि वट वृक्ष की जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में महादेव वास करते हैं। इनकी संयुक्त कृपा से घर में क्लेश दूर होता है और सुख-शांति आती है।

Vat Savitri Vrat 2026

वट सावित्री पूजा विधि
इस दिन सुहागिन महिलाएं सोलह श्रृंगार कर नए वस्त्र धारण करती हैं।
वट वृक्ष के नीचे सावित्री और सत्यवान की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।
बरगद के वृक्ष पर कच्चा सूत या रक्षासूत्र लपेटते हुए 108 या 7 बार परिक्रमा करें।
पूजा के अंत में सावित्री-सत्यवान की कथा अवश्य सुनें और पढ़े, क्योंकि इसके बिना व्रत अधूरा माना जाता है।

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