रविवार के दिन इस कथा का श्रवण करने से धन-धान्य में होगी वृद्धि

Edited By Updated: 16 Oct, 2022 02:34 PM

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धार्मिक ग्रंथों में इस बात का उल्लेख किया गया है कि सूर्य देव बहुत कल्याणकारी देव हैं। हिंदू धर्म में प्राचीन काल से सूर्य की उपासना और उपवास की परंपरा चली आ रही है। कहा जाता

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धार्मिक ग्रंथों में इस बात का उल्लेख किया गया है कि सूर्य देव बहुत कल्याणकारी देव हैं। हिंदू धर्म में प्राचीन काल से सूर्य की उपासना और उपवास की परंपरा चली आ रही है। कहा जाता है ज्योतिष शास्त्र में भी सूर्य का बहुत महत्व है। चंद्र, मंगल और गुरु ग्रह सूर्य देव के मित्र माने गए हैं, तो वहीं शनि और शुक्र शत्रु माने गए हैं। ऐसे में जिन जातकों का सूर्य कमजोर होता है उन्हें रविवार व्रत से विशेष लाभ प्राप्त होता है। सूर्य देव की पूजा और व्रत करने से कष्ट दूर होते हैं और जीवन में खुशहाली आती है। मान्यताओं के अनुसार अगर रविवार के दिन सूर्य देव की पूरी श्रद्धा भाव से पूजा-अर्चना की जाए तो मनुष्य के जीवन में सुख-समृद्धि और धन की कभी कमी नहीं होती। इतना ही नहीं जो व्यक्ति सूर्य देव का व्रत करने के साथ-साथ अगर इनकी व्रत कथा का श्रवण करते हैं या पढ़ते हैं तो तमाम इच्छाएं व मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। तो चलिए पढ़ते हैं सूर्य देव की व्रत कथा-

पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल के समय एक बुढ़िया थी। वह नियमित रूप से रविवार के व्रत किया करती थी। रविवार के दिन सूर्योदय से पहले उठकर बुढ़िया स्नान लेकर सभी काम निपटाने के बाद आंगन को गोबर से लीपकर स्वच्छ करती, उसके बाद सूर्य भगवान की पूजा करते हुए रविवार व्रत कथा सुनकर सूर्य भगवान का भोग लगाकर दिन में एक समय भोजन करती थी। तत्पश्चात सूर्य भगवान की कृपा से बुढ़िया के जीवन में किसी प्रकार की चिंता एवं कष्ट नहीं था। धीरे-धीरे उसका घर धन-धान्य से भर रहा था। उस बुढ़िया को सुखी होते देख उसकी पड़ोसन उससे जलती थी। बुढ़िया ने कोई गाय नहीं पाल रखी थी। इसी कारणवश वह अपनी पड़ोसन के आंगन में बंधी गाय का गोबर घर लाती थी। पड़ोसन ने चालाकी दिखाते हुए अपनी गाय को घर के भीतर बांध दिया। रविवार के दिन गोबर न मिलने से बुढ़िया अपना आंगन लीप नहीं सकी। आंगन में लिपाई न होने के कारण उस बुढ़िया ने सूर्य भगवान को भोग नहीं लगाया और उस दिन खुद भी भोजन ग्रहण नहीं किया। सूर्यास्त होने पर बुढ़िया भूखी-प्यासी ही सो गई।

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जब अगले दिन सूर्योदय से पहले बुढ़िया की आंख खुली तो वह अपना आंगन में सुंदर गाय व एक बछड़ा था। उसे देख वो बुढ़िया हैरान हो गई। गाय को आंगन में बांधकर उसने जल्दी से उसे चारा लाकर खिला दिया। पड़ोसन ने उस बुढ़िया के आंगन में बंधी सुंदर गाय और बछड़े को देखा तो वह उससे और अधिक जलने लगी। तभी गाय ने सोने का गोबर किया। गोबर को देखते ही पड़ोसन हैरान रह गई। बुढ़िया को वहां न पाकर पड़ोसन तुरंत ही उस गोबर को अपने घर ले आई और अपनी गाय का गोबर बुढ़िया के घर रख आई। सोने के गोबर से पड़ोसन कुछ ही दिनों में धनवान हो गई। गाय प्रति दिन सूर्योदय से पूर्व सोने का गोबर किया करती थी और बुढ़िया के उठने के पहले पड़ोसन उस गोबर को उठाकर ले जाती थी।

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काफी दिन बीत गए बुढ़िया को सोने के गोबर के बारे में कुछ पता नहीं चला। बुढ़िया हर रविवार की तरह सूर्यदेव का व्रत करती तथा कथा सुनती थी। सूर्य भगवान को जब पड़ोसन की चालाकी का पता चला तो उन्होंने तेज आंधी चलाई। आंधी का प्रकोप देखकर बुढ़िया ने गाय को घर के भीतर बांध दिया। सुबह उठकर बुढ़िया ने सोने का गोबर देखा उसे बहुत आश्चर्य हुआ। उस दिन के बाद से बुढ़िया ने गाय को घर के भीतर बांधना शुरु कर दिया। सोने के गोबर से बुढ़िया कुछ ही दिन में बहुत धनी हो गई। उसके धनी होने से पड़ोसन बुरी तरह जल-भुन गई और उसने अपने पति को समझा-बुझाकर उसे नगर के राजा के पास भेज दिया। सुंदर गाय को देखकर राजा बहुत खुश हुआ। सुबह जब राजा ने सोने का गोबर देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। राजा ने बुढ़िया से गाय और बछड़ा छीन लिया जिससे बुढ़िया की स्थिति फिर दयनीय हो गई।

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बुढ़िया ने विलाप करते हुए सूर्य देव से प्रार्थना की। बुढ़िया की इस हालात को देखकर सूर्य भगवान को उस पर दया आ गई। उसी रात सूर्य भगवान ने राजा को स्वप्न में कहा, राजन, बुढ़िया की गाय व बछड़ा तुरंत लौटा दो, नहीं तो तुम पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ेगा और तुम्हारा महल नष्ट हो जाएगा। सूर्य भगवान के स्वप्न में आने से राजा बुरी तरह भयभीत हो गया जिसके बाद प्रातः उठते ही गाय और बछड़ा बुढ़िया को लौटा दिया।

राजा ने गाय और बझड़ा तो वापस दिया ही साथ ही बहुत-सा धन देकर बुढ़िया से अपनी गलती के लिए क्षमा याचना भी की। राजा ने पड़ोसन और उसके पति को उनकी इस दुष्ट कर्म के लिए दंड दिया। फिर राजा ने पूरे राज्य में घोषणा करवा दी कि सभी स्त्री-पुरुष रविवार का व्रत किया करेंगे। अतः माना जाता है कि इसी के बाद से ही ये व्रत प्रचलन में आया।  

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