Edited By Sarita Thapa,Updated: 14 Feb, 2026 12:05 PM

हिंदू धर्म में विवाह को केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि एक पवित्र गृहस्थ आश्रम की शुरुआत माना जाता है। वहीं, महादेव वैराग्य और सन्यास के सर्वोच्च प्रतीक हैं।
Why Newlyweds Should not Touch Shivling : हिंदू धर्म में विवाह को केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि एक पवित्र गृहस्थ आश्रम की शुरुआत माना जाता है। वहीं, महादेव वैराग्य और सन्यास के सर्वोच्च प्रतीक हैं। अक्सर घर के बड़े-बुजुर्ग नवविवाहित जोड़ों को यह सलाह देते हैं कि वे मंदिर जाएं, जल चढ़ाएं, लेकिन भूलकर भी शिवलिंग का स्पर्श न करें। शास्त्रों के अनुसार, शिवलिंग अनंत ऊर्जा का वह पुंज है जिसकी प्रकृति वैरागी है। दूसरी ओर, एक नया शादीशुदा जोड़ा अपने जीवन के उस पड़ाव पर होता है जहां काम और मोह का प्रभाव अधिक होता है। ऐसे में एक वैरागी की ऊर्जा और एक गृहस्थ की ऊर्जा का सीधा संपर्क उनके दांपत्य जीवन में अनचाहा बदलाव ला सकता है। तो आइए जानते हैं आखिर इस मान्यता के पीछे का रहस्य क्या है। क्या यह केवल एक पुरानी परंपरा है, या इसके पीछे कोई गहरा रहस्य है।
ब्रह्मचर्य और संयम का प्रतीक हैं भगवान शिव
धार्मिक ग्रंथों में भगवान शिव को महान योगी और पूर्ण संयम का प्रतीक बताया गया है। शिवलिंग उसी तप, साधना और दिव्य ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है। नवविवाहित दंपत्ति जीवन के उस चरण में होते हैं जहां गृहस्थ जीवन की शुरुआत होती है, जबकि शिवलिंग वैराग्य और तपस्या का संकेत देता है। इस कारण माना जाता है कि इस अवस्था में दूरी बनाए रखना आध्यात्मिक संतुलन का संकेत है।
ऊर्जा संतुलन से जुड़ी मान्यता
शास्त्रों के अनुसार शिवलिंग में अत्यंत शक्तिशाली आध्यात्मिक ऊर्जा का वास माना जाता है। नवविवाहित जोड़े भावनात्मक और शारीरिक रूप से नए जीवन की शुरुआत में होते हैं, इसलिए कुछ परंपराओं में कहा गया है कि उन्हें सीधे शिवलिंग स्पर्श करने की बजाय दूर से जल अर्पित करना चाहिए। इससे श्रद्धा भी बनी रहती है और ऊर्जा संतुलन भी।

पूजा की मर्यादा और परंपरा
कई मंदिरों में नियम होते हैं कि शिवलिंग का स्पर्श सभी भक्तों के लिए अनिवार्य नहीं है। विशेष रूप से कुछ परंपराओं में नवविवाहितों को केवल दर्शन, अभिषेक या जल अर्पण करने की सलाह दी जाती है। यह मंदिरों की परंपरा और स्थानीय धार्मिक मान्यताओं पर भी निर्भर करता है।
पौराणिक मान्यता का संकेत
कुछ धार्मिक कथाओं में शिवलिंग को सृष्टि और शक्ति के संतुलन का प्रतीक बताया गया है। विवाह के बाद दंपत्ति स्वयं एक नई सृष्टि के मार्ग पर होते हैं, इसलिए उन्हें शिव-पूजा में विशेष नियमों के साथ शामिल होने की सलाह दी जाती है। यह निषेध पूर्ण रूप से स्थायी नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक माना जाता है।
क्या यह पूर्ण रूप से निषेध है ?
यह जानना जरूरी है कि सभी शास्त्रों में ऐसा स्पष्ट निषेध नहीं मिलता। कई विद्वान मानते हैं कि यह एक पारंपरिक मान्यता है, न कि कठोर धार्मिक नियम। श्रद्धा, शुद्ध भाव और नियमों का पालन सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना गया है, न कि केवल स्पर्श करना या न करना।

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