Shatak Review: सौ वर्षों के संघर्ष, विचार और समर्पण की प्रेरक गाथा

Updated: 20 Feb, 2026 04:12 PM

shatak movie review in hindi

यहां पढ़ें कैसी है फिल्म शतक

फिल्म: शतक (Shatak)
DIRECTED BY: आशीष मॉल (AASHISH MALL)
PRODUCED BY: वीर कपूर (VIR KAPUR) 
CONCEPT BY: अनिल धनपत अग्रवाल
(ANIL DHANPAT AGARWAL)
CO-PRODUCER: आशीष तिवारी
 (AASHISH TIWARI)
ASSOCIATE PRODUCER-
अशोक प्रधान (ASHOK PRADHAN), मयंक पटेल (MAYANK PATEL), कबीर सदानंद (KABIR SADANAND) 
WRITTEN BY:
 (नितिन सावंतNITIN SAWANT, रोहित गेहलोत (ROHIT GEHLOT), उत्सव दान UTSAV DAN)
EXECUTIVE PRODUCER: अभिनाव शिव तिवारी
 (ABHINAAV SHIV TIWARI)

रेटिंग: 3.5*

आज हम जिस भारत में जी रहे हैं, वहां विचार सिर्फ किताबों में नहीं, रोजमर्रा की बातचीत में टकराते हैं। हर पीढ़ी अपने सवाल लेकर खड़ी है और हर सवाल की एक पृष्ठभूमि है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) भी उन्हीं विषयों में से एक है, जिसका नाम आते ही अलग-अलग सोच सामने आ जाती है। करीब सौ साल पहले रखी गई नींव आज भी असर डालती दिखती है। ‘शतक’ इसी दूरी को भरने की कोशिश करती है, बीते समय और आज के बीच की दूरी। यह फिल्म सिर्फ घटनाओं की गिनती नहीं करती, बल्कि उस शुरुआत को समझने का मौका देती है, जहां से यह सफर शुरू हुआ था। वर्तमान को समझने के लिए अतीत की ओर देखने की जरूरत क्यों है, यही सवाल फिल्म अपने तरीके से सामने रखती है।

कहानी
फिल्म की कहानी की शुरुआत केशव बलिराम हेडगेवार से होती है, जो एक साधारण लेकिन दृढ़ निश्चयी व्यक्तित्व के रूप में सामने आते हैं। सीमित संसाधनों और साधारण परिस्थितियों में वे एक ऐसे संगठन की नींव रखते हैं, जिसका उद्देश्य राष्ट्रसेवा और चरित्र निर्माण है। खुले मैदानों में छोटी-छोटी बैठकों और युवाओं के साथ संवाद से एक विचार धीरे-धीरे आकार लेने लगता है।

जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, नेतृत्व माधव सदाशिव गोलवलकर के हाथों में आता है। यह दौर चुनौतियों से भरा हुआ दिखाया गया है। महात्मा गांधी की हत्या के बाद संगठन पर लगे प्रतिबंध और उससे उपजे तनावपूर्ण माहौल को संयमित तरीके से दर्शाया गया है। फिल्म इस समय को सनसनीखेज बनाने के बजाय संगठन के धैर्य और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया पर ध्यान देती है। कहानी में दादरा और नगर हवेली की आज़ादी और कश्मीर से जुड़ी घटनाओं को भी शामिल किया गया है, जहां संगठन की भूमिका को रेखांकित करने की कोशिश की गई है। हालांकि इन प्रसंगों को और विस्तार मिल सकता था, फिर भी ये कहानी के दायरे को व्यापक बनाते हैं।

फिल्म की खास बात यह है कि यह केवल बड़े नेताओं तक सीमित नहीं रहती। आम स्वयंसेवकों के जीवन, उनके परिवार से दूर रहने का दर्द, उनका त्याग और उनके विश्वास को भी कहानी में जगह दी गई है। यही मानवीय पक्ष फिल्म को भावनात्मक गहराई देता है।

निर्देशन
इस फिल्म की जान उसकी राइटिंग में है। नितिन सावंत, रोहित गहलोत और उत्सव दान ने कहानी को उलझाया नहीं है। भाषा सीधी है, घटनाएं साफ-साफ सामने आती हैं, इसलिए देखते वक्त कहीं भारीपन महसूस नहीं होता। पूरी कहानी की नींव अनिल धनपत अग्रवाल के कॉन्सेप्ट पर टिकी है। उनकी सोच साफ दिखती है, फोकस किसी एक घटना पर नहीं, बल्कि उस पूरे सफर पर है जिसमें एक विचार धीरे-धीरे आकार लेता है और आगे बढ़ता जाता है।

डायरेक्शन का जिम्मा आशीष मॉल ने बड़े ही सूझ-बूझ के साथ संभाला है। उन्होंने फिल्म को ओवरड्रामा से दूर रखा और हर सीन में जरूरी भावनाओं को ही जगह दी। वहीं प्रोड्यूसर वीर कपूर ने फिल्म की स्केल और क्वालिटी को मजबूत किया है। पूरी फिल्म में संतुलन और पेशेवर अंदाज साफ झलकता है, जो इसे ज्यादा असरदार बनाता है।

अभिनय 
फिल्म की शुरुआत केशव बलिराम हेडगेवार के चरित्र से होती है। उन्हें एक समर्पित, अनुशासित और दूरदर्शी व्यक्ति के रूप में दिखाया गया है। उनका किरदार सादगी और दृढ़ निश्चय का प्रतीक बनकर उभरता है।

इसके बाद नेतृत्व माधव सदाशिव गोलवलकर के हाथों में जाता है। उनके दौर में संगठन पर लगे प्रतिबंध और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों को गंभीरता से दर्शाया गया है। अभिनय में संतुलन और संयम देखने को मिलता है, खासकर उन दृश्यों में जहां संगठन कठिन दौर से गुजर रहा होता है।

फिल्म केवल बड़े नेताओं तक सीमित नहीं रहती, बल्कि आम स्वयंसेवकों के जीवन, त्याग और समर्पण को भी प्रमुखता देती है। यही मानवीय पक्ष अभिनय को और प्रभावी बनाता है।

संगीत और तकनीकी पक्ष
फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर शांत और गंभीर है, जो कहानी की प्रकृति के अनुरूप है। सिनेमैटोग्राफी सधी हुई है और रंगों का प्रयोग भी विषय की गंभीरता को ध्यान में रखकर किया गया है। संवाद सरल और सहज हैं, जिससे कहानी आम दर्शकों तक आसानी से पहुंचती है।

शतक एक गंभीर और विचारोत्तेजक फिल्म है, जो इतिहास के एक विशेष दौर और दृष्टिकोण को सामने लाती है। यह न पूरी तरह मनोरंजन प्रधान है और न ही पूरी तरह डॉक्यूमेंट्री बल्कि दोनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती है।यदि आपको इतिहास, विचारधारा और सामाजिक संगठनों की यात्रा में रुचि है, तो यह फिल्म निश्चित रूप से देखने योग्य है।

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