Edited By Mehak,Updated: 20 Feb, 2026 04:41 PM

कई शोधों के अनुसार ब्लड ग्रुप और कैंसर के जोखिम के बीच संबंध पाया गया है। AB और A ब्लड ग्रुप वालों में कोलोरेक्टल कैंसर का खतरा और दोबारा होने की संभावना अधिक देखी गई, जबकि O ब्लड ग्रुप वालों में रिकवरी और 5 साल तक जीवित रहने की दर बेहतर पाई गई।...
नेशनल डेस्क : हाल के वर्षों में हुई कई वैज्ञानिक शोधों से यह संकेत मिले हैं कि व्यक्ति का ब्लड ग्रुप कैंसर के खतरे और रिकवरी से जुड़ा हो सकता है। हालांकि यह याद रखना जरूरी है कि ब्लड ग्रुप अकेले कैंसर का कारण नहीं बनता, बल्कि यह जोखिम को थोड़ा बढ़ा या घटा सकता है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि अलग-अलग ब्लड ग्रुप और कैंसर के बीच क्या संबंध पाया गया है।
किस ब्लड ग्रुप में ज्यादा जोखिम?
कुछ शोध रिपोर्टों के अनुसार, AB ब्लड ग्रुप वाले लोगों में कोलोरेक्टल (आंत) कैंसर का खतरा अन्य ग्रुप्स की तुलना में अधिक पाया गया है। एक अध्ययन में यह जोखिम लगभग 3.5 गुना तक ज्यादा बताया गया। इसके अलावा, इलाज के बाद रिकवरी के आंकड़ों में भी AB ग्रुप के मरीजों की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर देखी गई।
'A' ब्लड ग्रुप और दोबारा कैंसर का खतरा
रिसर्च में यह भी पाया गया कि 'A' ब्लड ग्रुप वाले मरीजों में कोलन कैंसर के इलाज के बाद बीमारी दोबारा होने की संभावना 'O' ग्रुप की तुलना में ज्यादा हो सकती है। यानी इलाज के बाद इन्हें नियमित जांच और फॉलो-अप पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
मृत्यु दर और सर्वाइवल रेट
अध्ययनों के मुताबिक :
- AB ब्लड ग्रुप में मृत्यु दर सबसे अधिक दर्ज की गई।
- 'B' ब्लड ग्रुप वाले मरीजों में मृत्यु दर सबसे कम पाई गई।
- 'O' ब्लड ग्रुप वालों में इलाज के बाद औसत जीवनकाल और 5 साल तक जीवित रहने की दर सबसे बेहतर देखी गई।
'O' ग्रुप के मरीजों में 5 साल तक जीवित रहने की दर लगभग 88% से अधिक बताई गई, जो अन्य ग्रुप्स से बेहतर है।
ऐसा क्यों हो सकता है?
वैज्ञानिकों का मानना है कि ब्लड ग्रुप से जुड़े एंटीजन शरीर की इम्यून प्रतिक्रिया (रोग प्रतिरोधक क्षमता) और सूजन की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। खासकर 'O' ब्लड ग्रुप में मौजूद कुछ एंटीबॉडी कैंसर कोशिकाओं के विकास को धीमा करने में मदद कर सकते हैं। हालांकि इस विषय पर अभी और शोध की आवश्यकता है।
घबराने की नहीं, जागरूक रहने की जरूरत
यदि आपका ब्लड ग्रुप 'A' या 'AB' है, तो इसका मतलब यह नहीं कि आपको निश्चित रूप से कैंसर होगा। जीवनशैली, खान-पान, व्यायाम, धूम्रपान, शराब सेवन और पारिवारिक इतिहास जैसे कई अन्य कारक भी अहम भूमिका निभाते हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि 45 वर्ष की उम्र के बाद नियमित कैंसर स्क्रीनिंग करानी चाहिए, खासकर कोलोरेक्टल कैंसर की जांच। समय पर जांच और स्वस्थ जीवनशैली से जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।