Edited By Pardeep,Updated: 21 Feb, 2026 12:01 AM
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले के बाद प्रेस ब्रीफिंग की, जिसमें उनके व्यापक ग्लोबल टैरिफ को रद्द कर दिया गया।
इंटरनेशलन डेस्कः अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले के बाद प्रेस ब्रीफिंग की, जिसमें उनके व्यापक ग्लोबल टैरिफ को रद्द कर दिया गया। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए कहा कि राष्ट्रपति को एकतरफा टैरिफ तय करने और बदलने का अधिकार नहीं है, क्योंकि कर (टैक्स) लगाने की शक्ति स्पष्ट रूप से कांग्रेस को दी गई है।
मुख्य न्यायाधीश John G. Roberts Jr. ने अपने फैसले में लिखा, “संविधान निर्माताओं ने कर लगाने की शक्ति कार्यपालिका (Executive Branch) को नहीं दी है।”
किस मुद्दे पर हुआ फैसला?
यह फैसला 1977 के International Emergency Economic Powers Act (IEEPA) के तहत लगाए गए टैरिफ पर केंद्रित था। ट्रंप ने इसी कानून का हवाला देते हुए लगभग हर देश पर “रेसिप्रोकल” (जवाबी) टैरिफ लगाए थे। उन्होंने व्यापार घाटे को राष्ट्रीय आपातकाल घोषित कर इन शुल्कों को लागू किया था। यह मामला ट्रंप के व्यापक आर्थिक एजेंडे का पहला बड़ा मुद्दा था, जो सीधे देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचा। अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप ने तीन कंजर्वेटिव जज नियुक्त किए थे, जिससे अदालत की संरचना पर उनका असर रहा।
किन जजों ने असहमति जताई?
तीन जजों— सैमुअल अलिटो, क्लेरेंस थॉमस और ब्रेट कैवनॉ ने फैसले से असहमति जताई।
जस्टिस ब्रेट कैवनॉ ने लिखा: “ये टैरिफ सही नीति हैं या नहीं, यह अलग सवाल है। लेकिन कानून, इतिहास और पूर्व फैसलों के आधार पर ये स्पष्ट रूप से वैध हैं।”
ट्रंप का पहला रिएक्शन
फैसले की जानकारी ट्रंप को उस समय मिली जब वह दोनों पार्टियों के लगभग दो दर्जन गवर्नरों के साथ निजी बैठक कर रहे थे। सूत्रों के अनुसार, उन्होंने बहुमत के फैसले को “शर्मनाक” बताया। व्हाइट हाउस ने तुरंत कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की।
क्या कंपनियों को मिलेगा रिफंड?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह स्पष्ट नहीं किया कि कंपनियों को अब तक जमा किए गए अरबों डॉलर के टैरिफ वापस मिलेंगे या नहीं। कई कंपनियां, जिनमें बड़ी रिटेल चेन Costco भी शामिल है, निचली अदालतों में रिफंड की मांग कर चुकी हैं। जस्टिस कैवनॉ ने कहा कि रिफंड की प्रक्रिया जटिल हो सकती है और “एक तरह की अव्यवस्था” (mess) पैदा कर सकती है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, दिसंबर तक ट्रंप द्वारा लगाए गए आयात करों से ट्रेजरी को 133 अरब डॉलर से ज्यादा की वसूली हुई थी। अगले 10 वर्षों में इसका कुल असर लगभग 3 ट्रिलियन डॉलर तक आंका गया था।
क्या ट्रंप दूसरे कानूनों का सहारा ले सकते हैं?
यह फैसला ट्रंप को अन्य कानूनों के तहत टैरिफ लगाने से नहीं रोकता।
हालांकि, अन्य कानूनों में प्रक्रिया ज्यादा लंबी है, कार्रवाई की सीमा तय है और तुरंत बड़े पैमाने पर शुल्क लगाना आसान नहीं है। ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने संकेत दिया है कि वे दूसरे कानूनी रास्तों से टैरिफ ढांचा जारी रखने की कोशिश कर सकते हैं।
कानूनी चुनौती और ‘मेजर क्वेश्चन डॉक्ट्रिन’
टैरिफ के खिलाफ कई मुकदमे दायर हुए थे। दर्जन भर ज्यादातर डेमोक्रेट-समर्थित राज्यों ने, छोटे कारोबारियों ने, जो प्लंबिंग सामान से लेकर शैक्षणिक खिलौने और महिला साइक्लिंग कपड़े बेचते हैं। चुनौती देने वालों ने कहा कि IEEPA में टैरिफ का जिक्र ही नहीं है। बहुमत के तीन कंजर्वेटिव जजों ने “मेजर क्वेश्चन डॉक्ट्रिन” का हवाला दिया। इसके अनुसार, बड़े आर्थिक और राजनीतिक फैसलों के लिए कांग्रेस की स्पष्ट मंजूरी जरूरी होती है।
रॉबर्ट्स ने लिखा: “आपातकालीन कानूनों के लिए भी इस सिद्धांत में कोई अपवाद नहीं है।”
व्यापार समझौतों पर क्या असर पड़ेगा?
फैसले का अन्य देशों के साथ चल रही व्यापार वार्ताओं पर क्या असर पड़ेगा, यह अभी साफ नहीं है। यूरोपीय आयोग के प्रवक्ता ओलोफ गिल ने कहा कि वे अमेरिकी प्रशासन के संपर्क में हैं और स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार कर रहे हैं।
छोटे कारोबारियों ने मनाया जश्न
नेशनल रिटेल फेडरेशन ने इस फैसले को “बहुत जरूरी स्थिरता” देने वाला बताया। नॉर्थ कैरोलिना की व्यवसायी ऐन रॉबिन्सन, जो Scottish Gourmet नाम से कारोबार करती हैं, ने कहा कि फैसला सुनकर वह “खुशी से झूम उठीं।” ब्रिटेन के सामान पर लगे 10% बेसलाइन टैरिफ से उनके कारोबार पर करीब 30,000 डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ा था।
उन्होंने मजाक में कहा: “अब ‘टैरिफ को अलविदा’ सेल लगाने का समय आ गया है!”
राजनीतिक और जनमत का पहलू
ट्रंप ने इस मामले को अमेरिकी इतिहास के सबसे अहम मामलों में से एक बताया था और कहा था कि अगर फैसला उनके खिलाफ आया तो यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका होगा। हालांकि, कानूनी विरोध राजनीतिक सीमाओं से परे था। लिबर्टेरियन और प्रो-बिजनेस समूहों ने भी इसका विरोध किया। सर्वे बताते हैं कि टैरिफ आम जनता में बहुत लोकप्रिय नहीं हैं, खासकर बढ़ती महंगाई और जीवन-यापन की लागत को लेकर चिंता के बीच।