Edited By Tanuja,Updated: 11 May, 2026 05:07 PM

नेपाल में नए मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति को लेकर बड़ा संवैधानिक विवाद खड़ा हो गया है। Balen Shah सरकार ने वरिष्ठता सूची में चौथे नंबर के जज Manoj Sharma को चीफ जस्टिस बनाने की सिफारिश की, जिस पर न्यायपालिका और विपक्ष भड़क गए।
International Desk: नेपाल में नए मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति को लेकर सरकार और न्यायपालिका आमने-सामने आ गए हैं। प्रधानमंत्री बालेन शाह (Balen Shah) की अगुवाई वाली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के जज मनोज शर्मा (Manoj Sharma) को चीफ जस्टिस बनाने की सिफारिश की है, जबकि वह वरिष्ठता क्रम में चौथे नंबर पर हैं। नेपाल में दशकों से यह परंपरा रही है कि सुप्रीम कोर्ट के सबसे वरिष्ठ जज को ही मुख्य न्यायाधीश बनाया जाता है। ऐसे में सरकार के इस फैसले को न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला माना जा रहा है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश सपना प्रधान माल्ला (Sapana Pradhan Malla) ने खुलकर सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को ऐसी संस्था बनाने की कोशिश हो रही है जो सरकार के सामने “समर्पण” कर दे। उन्होंने कहा,“डर या राजनीतिक दबाव में न्याय नहीं दिया जा सकता। चाहे वह सरकार का दबाव हो या महाभियोग की धमकी।” विपक्ष ने भी इस फैसले का विरोध किया है। कई नेताओं ने कहा कि वरिष्ठता की परंपरा तोड़ने से न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे। सरकार का तर्क है कि मनोज शर्मा ने दूसरे वरिष्ठ जजों के मुकाबले ज्यादा फैसले दिए और उनकी कार्यक्षमता बेहतर रही।
लेकिन एक्टिंग चीफ जस्टिस मल्ला ने पूछा कि “काबिलियत” मापने का आधार क्या है। नेपाल की पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की (Sushila Karki) ने भी फैसले की तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा कि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता कमजोर होगी और एक योग्य महिला जज को मौका नहीं मिला। विशेषज्ञों का मानना है कि संविधान सरकार को जूनियर जज को नियुक्त करने से नहीं रोकता, लेकिन इससे भविष्य में सुप्रीम कोर्ट पर राजनीतिक प्रभाव बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है। यह विवाद ऐसे समय पर सामने आया है जब नेपाल पहले से राजनीतिक अस्थिरता और संस्थागत संघर्षों से जूझ रहा है।