बर्बाद हुई दो जिंदगियां: 65 दिन की शादी, 13 साल की लड़ाई, 40 केस... अब सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया अंतिम फैसला

Edited By Updated: 21 Jan, 2026 09:39 AM

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शादी का रिश्ता जीवन भर साथ निभाने के लिए होता है, लेकिन कभी-कभी यही रिश्ता इतनी कड़वाहट में बदल जाता है कि सालों तक अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। ऐसा ही एक असाधारण और चिंताजनक मामला देश की सर्वोच्च अदालत के सामने आया, जहां पति-पत्नी ने महज़ 65...

नेशनल डेस्क: शादी का रिश्ता जीवन भर साथ निभाने के लिए होता है, लेकिन कभी-कभी यही रिश्ता इतनी कड़वाहट में बदल जाता है कि सालों तक अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। ऐसा ही एक असाधारण और चिंताजनक मामला देश की सर्वोच्च अदालत के सामने आया, जहां पति-पत्नी ने महज़ 65 दिन साथ रहने के बाद पूरे 13 साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी। यह विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ लगभग 40 मुकदमे दर्ज करा दिए। अंततः सुप्रीम कोर्ट को न केवल इस विवाह को समाप्त करना पड़ा, बल्कि दोनों को फटकार लगाते हुए जुर्माना भी लगाना पड़ा।

कैसे शुरू हुआ विवाद
इस मामले में विवाह जनवरी 2012 में हुआ था। शादी के लगभग दो महीने बाद ही पत्नी ने ससुराल छोड़ दिया और पति व उसके परिजनों पर मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के आरोप लगाए। इसके बाद दोनों अलग-अलग रहने लगे। यहीं से शुरू हुआ मुकदमों का सिलसिला। दिल्ली और उत्तर प्रदेश की फैमिली कोर्ट, हाई कोर्ट और अन्य न्यायिक मंचों पर दोनों ने एक-दूसरे के खिलाफ लगातार केस दर्ज कराए।

अदालतें बन गईं संघर्ष का मैदान
मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने इसे गंभीरता से देखा. कोर्ट ने कहा कि यह मामला न्याय पाने से ज़्यादा एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाने की कोशिश बन चुका है। अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि पति-पत्नी ने न्यायिक मंचों को निजी लड़ाई का अखाड़ा बना दिया है, जिससे पूरी न्याय व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ पड़ा है।

जुर्माना और सख्त चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों पर 10-10 हजार रुपये का प्रतीकात्मक जुर्माना लगाया. कोर्ट ने निर्देश दिया कि यह राशि सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन में जमा कराई जाए। यह जुर्माना सिर्फ आर्थिक दंड नहीं था, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग के खिलाफ एक सख्त संदेश भी था।

अनुच्छेद 142 के तहत तलाक
शीर्ष अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 का प्रयोग करते हुए पति-पत्नी को तलाक देने का फैसला सुनाया. कोर्ट ने माना कि यह रिश्ता पूरी तरह टूट चुका है और इसे बचाने की कोई वास्तविक संभावना नहीं बची है। इसके साथ ही अदालत ने यह भी आदेश दिया कि भविष्य में दोनों एक-दूसरे के खिलाफ कोई नया मामला दाखिल नहीं कर पाएंगे, ताकि विवाद को हमेशा के लिए खत्म किया जा सके।

बढ़ते वैवाहिक मुकदमों पर कोर्ट की चिंता
इस मामले को उदाहरण बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाल के वर्षों में वैवाहिक विवादों से जुड़े मुकदमे तेजी से बढ़े हैं. खासकर ट्रांसफर याचिकाओं की संख्या चिंताजनक है, जिनमें एक पक्ष दूसरे के मामले को अलग अदालत में ले जाने की मांग करता है। कोर्ट ने कहा कि जैसे ही आपराधिक मुकदमे शुरू होते हैं, रिश्तों के सुधरने की संभावना बेहद कम हो जाती है।

मध्यस्थता को बताया बेहतर विकल्प
सुप्रीम कोर्ट ने सलाह दी कि ऐसे मामलों में शुरुआती स्तर पर बातचीत और मध्यस्थता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. अगर परिवार और समाज समय रहते हस्तक्षेप करें, तो कई रिश्ते अदालतों तक पहुंचने से पहले ही संभल सकते हैं। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्वीकार किया कि जब रिश्ता पूरी तरह टूट जाए, तब उसे कानूनी रूप से समाप्त कर देना ही दोनों पक्षों के हित में होता है।

एक मामले से बड़ा संदेश
यह मामला सिर्फ एक पति-पत्नी की लड़ाई नहीं है, बल्कि न्यायिक प्रणाली के दुरुपयोग की एक गंभीर मिसाल है। 65 दिन की शादी और 13 साल की कानूनी जंग ने दो ज़िंदगियों को तो उलझाया ही, साथ ही अदालतों की कीमती समय और संसाधनों को भी प्रभावित किया। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला साफ संदेश देता है कि निजी प्रतिशोध के लिए अदालतों का इस्तेमाल स्वीकार्य नहीं है और कानून का मकसद समाधान है, न कि अंतहीन संघर्ष।
 

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