Edited By Anu Malhotra,Updated: 30 Oct, 2026 05:32 PM
उम्र बढ़ने के साथ शरीर में कई तरह के बदलाव होने लगते हैं, जिनमें मांसपेशियों का कमजोर होना भी एक आम समस्या है। अक्सर माना जाता है कि बढ़ती उम्र के कारण मांसपेशियों की ताकत कम हो जाती है, लेकिन इसके पीछे एक खास जैविक प्रक्रिया भी काम करती है।...
नई दिल्ली: उम्र बढ़ने के साथ शरीर में कई तरह के बदलाव होने लगते हैं, जिनमें मांसपेशियों का कमजोर होना भी एक आम समस्या है। अक्सर माना जाता है कि बढ़ती उम्र के कारण मांसपेशियों की ताकत कम हो जाती है, लेकिन इसके पीछे एक खास जैविक प्रक्रिया भी काम करती है। कोपेनहेगन विश्वविद्यालय के नए शोध में वैज्ञानिकों ने पाया है कि उम्र बढ़ने के साथ मांसपेशियां अपनी कोशिकाओं को नुकसान से बचाने के लिए ताकत से समझौता करने लगती हैं।
चूहों पर किए गए इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया कि एक महत्वपूर्ण अणु को आंशिक रूप से बहाल करने से मांसपेशियों के क्षय के लक्षणों को काफी हद तक ठीक किया जा सकता है। इससे भविष्य में उम्र से संबंधित मांसपेशियों की कमजोरी के उपचार की नई उम्मीदें जाग गई हैं।
मांसपेशी तंतुओं में बदलाव क्यों होता है?
हमारे शरीर के मांसपेशी ऊतक (Muscle tissue) में अलग-अलग तरह के तंतु (Fibers) होते हैं:
Fast-twitch fibers: ये बहुत शक्तिशाली और तेज गति पैदा करते हैं, लेकिन जल्दी थक जाते हैं।
Slow-twitch fibers: ये लगातार काम करने में मदद करते हैं और इनमें माइटोकॉन्ड्रिया की मात्रा अधिक होती है, जो ऊर्जा पैदा करने का काम करते हैं।
उम्र बढ़ने के साथ मांसपेशियों की ताकत घटने लगती है और माइटोकॉन्ड्रिया की कार्यक्षमता भी कमजोर होने लगती है। हैरानी की बात यह है कि उम्र ढलने के साथ मांसपेशियां ऐसे धीमी गति वाले रेशों की तरफ बढ़ने लगती हैं जो उन्हीं कमजोर माइटोकॉन्ड्रिया पर ज्यादा निर्भर होते हैं। वैज्ञानिकों के सामने सवाल यह था कि मांसपेशियां एक ऐसी ऊर्जा प्रणाली पर क्यों निर्भर होने लगती हैं जो खुद कमजोर हो रही है?
इस पहेली को सुलझाने के लिए शोधकर्ताओं ने कार्डियोलिपिन (Cardiolipin) पर ध्यान केंद्रित किया। यह एक खास तरह का वसा अणु (Fat molecule) है जो माइटोकॉन्ड्रिया की आंतरिक झिल्ली में होता है। यह झिल्ली को सही आकार में रखता है ताकि ऊर्जा का उत्पादन ठीक से हो सके।
शोध में पाया गया कि उम्र बढ़ने या बीमारी के कारण चूहों और इंसानों दोनों में कार्डियोलिपिन का स्तर कम हो जाता है। जब वैज्ञानिकों ने युवा चूहों में प्रयोगशाला के जरिए कार्डियोलिपिन का स्तर कम किया, तो उनके शरीर में भी ठीक वैसे ही बदलाव देखे गए जो बूढ़े चूहों और इंसानों में होते हैं (यानी मांसपेशी तंतु तीव्र से धीमी गति वाले प्रकार में बदल गए)।
सबसे बड़ी सफलता तब मिली जब वैज्ञानिकों ने कार्डियोलिपिन के स्तर को उसकी सामान्य मात्रा के लगभग दो-तिहाई हिस्से तक वापस बहाल किया। इससे न सिर्फ मांसपेशियों का क्षय रुक गया, बल्कि चूहों में असमय मृत्यु का खतरा भी टल गया।
ताकत का त्याग और सुरक्षात्मक तंत्र
आगे के प्रयोगों से यह पता चला कि मांसपेशियों का यह बदलाव वास्तव में एक सुरक्षात्मक प्रतिक्रिया (Protective response) है।
आरओएस (ROS) का उत्पादन: कार्डियोलिपिन कम होने पर क्षतिग्रस्त माइटोकॉन्ड्रिया 'रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज' (ROS) नामक अत्यधिक सक्रिय अणु बनाते हैं। ये अणु कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं, लेकिन साथ ही बदलाव का संकेत भी देते हैं। ERRγ नाम का एक प्रोटीन इस पूरी प्रक्रिया को नियंत्रित करता है। यह कोशिकाओं को अपने माइटोकॉन्ड्रिया को फिर से व्यवस्थित करने का निर्देश देता है। कार्डियोलिपिन की कमी वाले चूहों ने खून से ज्यादा ग्लूकोज लिया, लेकिन उसका इस्तेमाल ऊर्जा के लिए नहीं बल्कि अपने खुद के एंटीऑक्सीडेंट बनाने में किया ताकि वे ROS के बुरे प्रभावों से बच सकें।
अध्ययन के मुख्य लेखक फैबियन फिंगर (Fabian Finger) का कहना है कि फाइबर बदलने का मतलब यह नहीं है कि मांसपेशियां कमजोर हो रही हैं, बल्कि मांसपेशियां सुरक्षा के लिए अपनी ताकत का सौदा कर रही हैं। यही वजह है कि अगर आप एंटीऑक्सीडेंट देकर इस प्रक्रिया में दखल दें, तो मांसपेशियों की हालत और बिगड़ सकती है।
इलाज की नई संभावनाएं
भले ही यह परीक्षण अभी चूहों पर किया गया हो, लेकिन इंसानों के नमूनों से भी यह साबित हो चुका है कि उम्र बढ़ने के साथ इंसानों में भी कार्डियोलिपिन का स्तर घटता है। वैज्ञानिकों के पास अब इस दिशा में आगे बढ़ने के कुछ रास्ते हैं:
एलामिप्रेटाइड : हाल ही में FDA ने 'बार्थ सिंड्रोम' (एक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी) के लिए इस दवा को मंजूरी दी है, जो कार्डियोलिपिन को स्थिर रखती है।
ERRγ को लक्ष्य बनाना: यह प्रोटीन कोशिकाओं को तनाव से निपटने में मदद करता है, और इस पर पहले से ही प्रीक्लिनिकल रिसर्च चल रही है।
इस अध्ययन के वरिष्ठ लेखक ज़ाचरी गेरहार्ट-हाइन्स (Zachary Gerhart-Hines) का कहना है कि सबसे बड़ी उम्मीद यह है कि कार्डियोलिपिन में थोड़ा सा सुधार भी मांसपेशियों को वापस लाने के लिए काफी था। अब असली चुनौती यह पता लगाना है कि क्या हम वृद्ध मांसपेशियों में कार्डियोलिपिन बढ़ा सकते हैं या ERRγ को लक्षित करके प्राकृतिक सुरक्षा को बढ़ावा दे सकते हैं।