Property Rights: क्या माता-पिता किसी एक ही बच्चे के नाम ट्रांसफर कर सकतें हैं पूरी जायदाद? जानिए कानून

Edited By Updated: 30 Jul, 2026 02:05 PM

can parents transfer all their property to the name of just one child

परिवारों में संपत्ति के बंटवारे को लेकर अक्सर भ्रम और विवाद की स्थिति बनी रहती है। सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या माता-पिता अपनी पूरी जायदाद किसी एक ही बच्चे (बेटे या बेटी) के नाम ट्रांसफर कर सकते हैं। क्या ऐसा होने पर अन्य बच्चों के पास कोर्ट...

नई दिल्ली : परिवारों में संपत्ति के बंटवारे को लेकर अक्सर भ्रम और विवाद की स्थिति बनी रहती है। सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या माता-पिता अपनी पूरी जायदाद किसी एक ही बच्चे (बेटे या बेटी) के नाम ट्रांसफर कर सकते हैं। क्या ऐसा होने पर अन्य बच्चों के पास कोर्ट जाने का रास्ता बचता है? आपको बता दें कि भारतीय कानून के तहत संपत्ति पर अधिकार इस बात पर निर्भर करता है कि संपत्ति खुद की कमाई (Self-Acquired) से खरीदी गई है या पैतृक (Ancestral) है। आइए इसे आसान भाषा में समझें।

1. स्व-अर्जित संपत्ति 

यदि माता-पिता ने कोई घर, जमीन या प्लॉट अपनी मेहनत और कमाई से खरीदा है तो उस पर उनका पूर्ण अधिकार होता है। माता-पिता अपनी मर्जी से पूरी संपत्ति किसी एक बेटे या बेटी के नाम कर सकते हैं। इसके लिए वे अपने जीवनकाल में रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड बनवा सकते हैं या वसीयत लिख सकते हैं। कानूनन, दूसरे बच्चे इस संपत्ति पर अपना दावा नहीं ठोक सकते।

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2. पैतृक संपत्ति 

दादा या परदादा के समय से चली आ रही संपत्ति के नियम बिल्कुल अलग होते हैं। पैतृक संपत्ति पर परिवार के सभी कानूनी वारिसों का जन्मजात अधिकार होता है। माता-पिता अपनी इच्छा से पूरी पैतृक संपत्ति किसी एक बच्चे को नहीं दे सकते। यदि पैतृक संपत्ति का बंटवारा नियम विरुद्ध किया जाता है तो वंचित वारिस अदालत में चुनौती देकर अपना कानूनी हिस्सा मांग सकते हैं।

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3. बेटियों का संपत्ति में अधिकार

हिंदू उत्तराधिकार कानून (संशोधन) के अनुसार बेटियों को भी पैतृक संपत्ति में बेटों के बराबर अधिकार प्राप्त हैं। बेटी शादीशुदा हो या अविवाहित, उसका पैतृक संपत्ति में हक खत्म नहीं होता। पैतृक संपत्ति के बंटवारे के समय बेटियों के हिस्से को नजरअंदाज करना कानूनी रूप से गलत है।

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4. गिफ्ट डीड और वसीयत को कब दी जा सकती है चुनौती?

यद्यपि स्व-अर्जित संपत्ति में माता-पिता का फैसला अंतिम माना जाता है लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में वसीयत या गिफ्ट डीड को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। यदि यह साबित हो जाए कि गिफ्ट डीड या वसीयत किसी दबाव, धोखे या जालसाजी से बनवाई गई थी। यदि दस्तावेज बनाते समय संपत्ति मालिक की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी।

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वहीं कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार संपत्ति से जुड़े विवादों से बचने के लिए माता-पिता को जीवनकाल में ही स्पष्ट वसीयत या रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड बनवा लेनी चाहिए। सही कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करने और परिवार में पारदर्शिता रखने से भविष्य में कोर्ट-कचहरी के चक्करों से बचा जा सकता है।
 

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