Edited By Mansa Devi,Updated: 11 Jan, 2026 01:50 PM

कांग्रेस ने रविवार को एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया कि वायु गुणवत्ता एक राष्ट्रव्यापी, संरचनात्मक संकट है जिसके लिए सरकार की प्रतिक्रिया "अत्यंत अप्रभावी और अपर्याप्त" है। विपक्षी दल ने राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम में व्यापक सुधार की...
नेशनल डेस्क: कांग्रेस ने रविवार को एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया कि वायु गुणवत्ता एक राष्ट्रव्यापी, संरचनात्मक संकट है जिसके लिए सरकार की प्रतिक्रिया "अत्यंत अप्रभावी और अपर्याप्त" है। विपक्षी दल ने राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम में व्यापक सुधार की मांग की। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि सरकार जिस एनसीएपी को ‘नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम' (राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम) बताकर प्रचारित कर रही है, वह असल में एनसीएपी का ही एक और रूप यानी “नोशनल क्लीन एयर प्रोग्राम” है।
पूर्व पर्यावरण मंत्री ने कहा कि सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) द्वारा किए गए एक नए विश्लेषण ने अब इस बात की पुष्टि कर दी है कि भारत का "सबसे खराब छिपा हुआ रहस्य" यह है कि वायु गुणवत्ता एक राष्ट्रव्यापी, संरचनात्मक संकट है जिसके लिए सरकार की प्रतिक्रिया बेहद अप्रभावी और अपर्याप्त है। रमेश ने एक बयान में कहा कि उपग्रह डेटा का उपयोग करते हुए किए गए अध्ययन में पाया गया कि भारत के लगभग 44 प्रतिशत शहरों, यानी आकलन वाले 4,041 वैधानिक शहरों में से 1,787 शहर लगातार वायु प्रदूषण की गंभीर चपेट में हैं और इन शहरों में पांच वर्षों (2019-2024, 2020 को छोड़कर) के दौरान हवा में वार्षिक पीएम 2.5 का स्तर लगातार राष्ट्रीय मानकों के ऊपर बना रहा है।
उन्होंने कहा कि रिपोर्ट ने राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) की अक्षमता को भी उजागर किया है। उनके मुताबिक, समस्या के विशाल पैमाने (1787 शहर) के बावजूद एनसीएपी के तहत केवल 130 शहरों को शामिल किया गया। कांग्रेस नेता ने दावा किया कि इन 130 शहरों में से 28 शहरों में अब भी निरंतर परिवेशी वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशन (सीएएक्यूएमएस) मौजूद नहीं हैं। रमेश ने बताया कि निगरानी अवसंरचना वाले 102 शहरों में से 100 शहरों में पीएम10 का स्तर 80 प्रतिशत या उससे अधिक पाया गया।
उन्होंने कहा कि कुल मिलाकर, एनसीएपी वर्तमान में भारत के गंभीर रूप से प्रदूषित शहरों में से केवल चार प्रतिशत शहरों को कवर करता है। उन्होंने कहा कि जिस एनसीएपी को राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, वह वास्तव में एक अलग ही किस्म का एनसीएपी बन गया- ‘नोशनल स्वच्छ वायु कार्यक्रम'। कांग्रेस नेता ने कहा कि अब इसकी गहन समीक्षा, व्यापक सुधार और पुनर्गठन की सख्त जरूरत है।
रमेश ने कहा, “पहला कदम भारत के बड़े हिस्से में वायु प्रदूषण से जुड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट को स्वीकार करना होना चाहिए। परिणामस्वरूप, इस संकट को देखते हुए, हमें वायु प्रदूषण (नियंत्रण और रोकथाम) अधिनियम 1981 और नवंबर 2009 में लागू किए गए राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों (एनएएक्यूएस), दोनों की फिर से समीक्षा करनी चाहिए और उनमें पूर्णतः संशोधन करना चाहिए।” उन्होंने बताया कि भारतीय मानकों (एनएएक्यूएस) के अनुसार हवा में अतिसूक्ष्म कणों की स्वीकार्य मात्रा 24 घंटे में 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और सालाना 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक यह मात्रा 24 घंटे में 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से कम और साल भर में पांच माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से कम होनी चाहिए।
रमेश ने सरकार से एनसीएपी के तहत उपलब्ध कराए जाने वाले कोष में भारी वृद्धि करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, “एनसीएपी की धनराशि और 15वें वित्त आयोग के अनुदानों को मिलाकर मौजूदा बजट लगभग 10,500 करोड़ रुपये है, जो 131 शहरों में वितरित किया गया है। हमारे शहरों को कम से कम 10-20 गुना अधिक धनराशि की आवश्यकता है। एनसीएपी को 25,000 करोड़ रुपये का कार्यक्रम बनाया जाना चाहिए और इसे देश के 1,000 सबसे प्रदूषित शहरों/कस्बों में वितरित किया जाना चाहिए।”
पूर्व पर्यावरण मंत्री ने कहा कि एनसीएपी को अपने प्रदर्शन का पैमाना पीएम 2.5 के स्तर को बनाना चाहिए और एनसीएपी को अपना ध्यान प्रमुख प्रदूषण स्रोतों पर केंद्रित करना चाहिए जैसे ठोस ईंधनों का जलाना, वाहन उत्सर्जन और औद्योगिक उत्सर्जन। उन्होंने तर्क दिया, "एनसीएपी को कानूनी आधार दिया जाना चाहिए, उसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए मजबूत प्रवर्तन व्यवस्था होनी चाहिए, और केवल ‘नॉन अटेनमेंट' शहरों तक सीमित रहने के बजाय देश के हर शहर के लिए गंभीर और सशक्त डेटा निगरानी क्षमता विकसित की जानी चाहिए।”
रमेश ने जोर देकर कहा कि कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के लिए वायु प्रदूषण मानदंडों को तत्काल लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अब तक संसद में दो बार- पहली दफा 29 जुलाई 2024 को और दूसरी बार नौ दिसंबर 2025 को- मोदी सरकार ने वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को कमतर दिखाने की कोशिश की है। मोदी सरकार सच में अनजान नहीं है, बल्कि वह अपनी अक्षमताओं और लापरवाही के पैमाने को छिपाने का प्रयास कर रही है।