Edited By Mansa Devi,Updated: 07 Jan, 2026 05:15 PM

अमेरिका के छोटे शहर में एक बुजुर्ग के लैपटॉप पर अचानक मैसेज आया कि उनका सिस्टम हैक हो गया है और तुरंत माइक्रोसॉफ्ट सपोर्ट से संपर्क करें। डर के मारे उन्होंने स्क्रीन पर दिखाए नंबर पर कॉल किया। फोन के दूसरी तरफ से आई आवाज़ कहती है, “Hello Sir, this...
नेशनल डेस्क: अमेरिका के छोटे शहर में एक बुजुर्ग के लैपटॉप पर अचानक मैसेज आया कि उनका सिस्टम हैक हो गया है और तुरंत माइक्रोसॉफ्ट सपोर्ट से संपर्क करें। डर के मारे उन्होंने स्क्रीन पर दिखाए नंबर पर कॉल किया। फोन के दूसरी तरफ से आई आवाज़ कहती है, “Hello Sir, this is Microsoft Technical Support”। इसी कॉल के बाद उनकी सारी बचत निकाल ली गई। यह मामला केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है, बल्कि ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में भी ऐसे हजारों केस सामने आए हैं। जांच एजेंसियों के मुताबिक, इन फर्जी कॉल ऑपरेशन्स की जड़ें भारत में हैं।
फर्जी कॉल सेंटर कैसे काम करते हैं
जांच में पता चला कि ये कॉल सेंटर बिल्कुल प्रोफेशनल तरीके से चलते हैं। एजेंट्स को डर और भरोसा पैदा करने, पैसे निकालने और मानसिक दबाव बनाने की ट्रेनिंग दी जाती है। सभी एजेंट्स को ब्रिटिश या अमेरिकी ऐक्सेंट में अंग्रेज़ी बोलने की ट्रेनिंग दी जाती है और उनके फर्जी नाम रखे जाते हैं।
नकली अलर्ट से शिकार बनाया जाता है
यह पूरा खेल अक्सर नकली पॉप-अप या सिस्टम अलर्ट से शुरू होता है। यूज़र को दिखाया जाता है कि उसका कंप्यूटर वायरस से संक्रमित है या बैंक अकाउंट खतरे में है। कुछ मामलों में सर्च रिज़ल्ट में ही फर्जी हेल्पलाइन नंबर ऊपर दिखा दिए जाते हैं। जब शिकार कॉल करता है, तो एजेंट खुद को माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न या बैंक सपोर्ट बताकर बातचीत शुरू करता है।
रिमोट एक्सेस के जरिए कंट्रोल
इसके बाद पीड़ित के कंप्यूटर पर AnyDesk या TeamViewer जैसे रिमोट एक्सेस टूल इंस्टॉल करवा लिए जाते हैं। एजेंट कंप्यूटर पर कंट्रोल लेकर नकली सिस्टम एरर या झूठे बैंक लॉग दिखाकर शिकार को डराता है। डर इतना बढ़ जाता है कि शिकार बिना सोच-समझे पैसे भेज देता है। भुगतान आमतौर पर गिफ्ट कार्ड, क्रिप्टोकरेंसी या वायर ट्रांसफर के जरिए करवाया जाता है, ताकि ट्रैक करना मुश्किल हो।
भारत से अंतरराष्ट्रीय ऑपरेशन
जांच में यह भी सामने आया कि भारत में पकड़े गए कई कॉल सेंटर पूरी तरह विदेशों को टारगेट कर रहे थे। एजेंट्स को स्क्रिप्ट, कॉल लॉग, VPN, इंटरनेशनल नंबर और भावनात्मक दबाव डालने की ट्रेनिंग दी जाती थी। यही वजह है कि यह अपराध अब सिर्फ साइबर फ्रॉड नहीं रहा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध बन चुका है।
सरकारी और अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई
CBI और ED समय-समय पर ऐसे नेटवर्क पर कार्रवाई कर रहे हैं। अमेरिका और अन्य देशों की एजेंसियां भारतीय एजेंसियों के साथ जानकारी साझा करती हैं। तकनीकी कंपनियां भी ऐसे फर्जी नेटवर्क ब्लॉक करने का दावा करती हैं।
समस्या सिर्फ पकड़े जाने तक नहीं खत्म होती
विशेषज्ञों के अनुसार, यह मॉडल सस्ता, तेज़ और मुनाफे वाला है। डिजिटल टूल्स, VPN और फर्जी पहचान के चलते असली मास्टरमाइंड तक पहुंचना मुश्किल होता है। डर की मनोविज्ञान भी इंसान को जल्दी तोड़ देती है, जिससे शिकार सवाल पूछने की स्थिति में नहीं रहता।
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि साइबर फ्रॉड के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। भारत में 1930 हेल्पलाइन और साइबर क्राइम पोर्टल को मजबूत किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि जैसे ही धोखाधड़ी का शक हो, तुरंत रिपोर्ट करना चाहिए, वरना पैसे की रिकवरी मुश्किल हो जाती है। विशेषज्ञों की चेतावनी है कि जब तक लीड जनरेशन, पेमेंट चैनल और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एक साथ सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक यह ग्लोबल स्कैम नए नाम और नए तरीकों से चलता रहेगा।